489 KM लंबा ट्रैक, 270 KM सुरंगें और दुनिया का सबसे ऊंचा रेलवे स्टेशन… क्यों खास है बिलासपुर-मनाली-लेह रेल लाइन?
बिलासपुर-मनाली-लेह रेल लाइन भारत की सबसे महत्वाकांक्षी रेलवे परियोजनाओं में शामिल है. 1.31 लाख करोड़ रुपए की लागत वाली इस 489 किलोमीटर लंबी रेल लाइन में 270 किलोमीटर का हिस्सा सुरंगों से गुजरेगा.
Bilaspur-Manali-Leh Railway Line: हिमाचल प्रदेश से लद्दाख तक रेलवे कनेक्टिविटी पहुंचाने की तैयारी है. 489 किलोमीटर लंबी इस रेल लाइन पर करीब 270 किलोमीटर का हिस्सा सुरंगों से होकर गुजरेगा. तंगलंग ला दर्रे के नीचे 5,256 मीटर की ऊंचाई पर रेलवे स्टेशन बनाने की योजना है, जो दुनिया का सबसे ऊंचा रेलवे स्टेशन बन सकता है. इस महत्वाकांक्षी परियोजना की अनुमानित लागत 1.31 लाख करोड़ रुपए है.
भारत में रेलवे नेटवर्क का विस्तार अब हिमालय के बेहद ऊंचे और दुर्गम इलाकों तक पहुंचाने की तैयारी है. केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी बिलासपुर-मनाली-लेह रेल लाइन परियोजना पूरी होने पर देश के रेलवे इतिहास में एक नया अध्याय जुड़ सकता है. इस रेल लाइन पर दुनिया का सबसे ऊंचा रेलवे स्टेशन बनाने की योजना है. यह स्टेशन समुद्र तल से करीब 5,256 मीटर की ऊंचाई पर बनाया जा सकता है. अगर यह योजना तय रूपरेखा के मुताबिक पूरी होती है तो भारत चीन के मौजूदा रिकॉर्ड को पीछे छोड़ देगा.
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इस परियोजना की खास बात सिर्फ दुनिया का सबसे ऊंचा रेलवे स्टेशन ही नहीं है, बल्कि इसमें बनने वाली लंबी सुरंगें और कठिन पहाड़ी रास्ते भी हैं. करीब 489 किलोमीटर लंबी इस रेल लाइन में लगभग 270 किलोमीटर हिस्सा सुरंगों से होकर गुजरेगा. रेलवे मंत्रालय इसका डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट (DPR) तैयार कर चुका है. रिपोर्ट के मुताबिक, इस पूरी परियोजना पर करीब 1.31 लाख करोड़ रुपए खर्च होने का अनुमान है. यह परियोजना रक्षा मंत्रालय की रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण परियोजनाओं में भी शामिल है.
489 किलोमीटर लंबी होगी बिलासपुर-लेह रेल लाइन
प्रस्तावित बिलासपुर-मनाली-लेह रेलवे लाइन हिमाचल प्रदेश को लद्दाख से जोड़ने का काम करेगी. करीब 489 किलोमीटर लंबे इस ब्रॉडगेज रेल कॉरिडोर का रास्ता कई महत्वपूर्ण शहरों और पहाड़ी इलाकों से होकर गुजरेगा. इसमें बिलासपुर, सुंदरनगर, मंडी, मनाली, सिस्सू, दारचा, केलांग, सरचू, पांग, रुमत्से, उपशी और खारू जैसे स्थान शामिल हैं. इस रेल लाइन का अंतिम स्टेशन लेह होगा.
यह रेल मार्ग हिमालय के उन इलाकों से होकर गुजरेगा, जहां भौगोलिक परिस्थितियां काफी चुनौतीपूर्ण हैं. यहां ऊंचे पहाड़, गहरी घाटियां, बर्फबारी और खराब मौसम निर्माण कार्य को मुश्किल बना सकते हैं. यही वजह है कि इस परियोजना को भारत की सबसे चुनौतीपूर्ण रेल परियोजनाओं में गिना जा रहा है. रेलवे मंत्रालय के मुताबिक, इस रेल लाइन का सर्वे पूरा किया जा चुका है और इसकी विस्तृत परियोजना रिपोर्ट यानी DPR भी तैयार है. हालांकि, DPR तैयार होने का मतलब यह नहीं है कि परियोजना के निर्माण को अंतिम मंजूरी मिल गई है.
5,256 मीटर की ऊंचाई पर बनेगा रेलवे स्टेशन
इस परियोजना की सबसे बड़ी खासियत तंगलंग ला दर्रे के नीचे प्रस्तावित रेलवे स्टेशन है. इसे समुद्र तल से करीब 5,256 मीटर की ऊंचाई पर बनाने की योजना है. अगर यह स्टेशन प्रस्तावित ऊंचाई और रूट के मुताबिक बनता है तो यह दुनिया का सबसे ऊंचा रेलवे स्टेशन बन जाएगा. फिलहाल दुनिया के सबसे ऊंचे रेलवे स्टेशन का रिकॉर्ड चीन के तांगगुला रेलवे स्टेशन के नाम है. यह स्टेशन चीन की छिंगहाई-तिब्बत रेलवे लाइन पर स्थित है और समुद्र तल से करीब 5,068 मीटर की ऊंचाई पर है. भारत में प्रस्तावित स्टेशन इससे करीब 188 मीटर ज्यादा ऊंचाई पर होगा.
तंगलंग ला दर्रा मनाली-लेह हाईवे पर स्थित है और भारत के सबसे ऊंचे मोटर वाहन मार्गों में शामिल है. इस इलाके में सड़क बनाना ही इंजीनियरिंग के लिहाज से बड़ी चुनौती है. ऐसे में यहां रेलवे लाइन और स्टेशन का निर्माण करना और भी मुश्किल होगा. इसके लिए आधुनिक तकनीक, मजबूत सुरंग निर्माण व्यवस्था और विशेष इंजीनियरिंग की जरूरत पड़ेगी.
270 किलोमीटर लंबी सुरंगों से गुजरेगी ट्रेन
बिलासपुर-मनाली-लेह रेल लाइन की दूसरी बड़ी विशेषता इसमें बनने वाली सुरंगें हैं. करीब 489 किलोमीटर लंबे रेल कॉरिडोर में लगभग 270 किलोमीटर हिस्सा सुरंगों के अंदर होगा. यानी इस रेल लाइन का आधे से ज्यादा हिस्सा पहाड़ों के भीतर से गुजरेगा. हिमालयी क्षेत्र में सुरंगों का निर्माण करना आसान नहीं होता. यहां पहाड़ों की चट्टानों की बनावट अलग-अलग है. कहीं कमजोर चट्टानें हैं तो कहीं जमीन के अंदर पानी और भूस्खलन जैसी समस्याएं सामने आ सकती हैं.
इसके अलावा अत्यधिक ऊंचाई पर ऑक्सीजन की कमी, बर्फबारी और तापमान में भारी गिरावट भी निर्माण कार्य को प्रभावित कर सकती है. रेलवे मंत्रालय ने भी इस परियोजना में भूगर्भीय परिस्थितियों और निर्माण से जुड़ी चुनौतियों को महत्वपूर्ण बताया है. ऐसे में सुरंगों का निर्माण इस परियोजना का सबसे कठिन और खर्चीला हिस्सा हो सकता है. इतनी बड़ी संख्या में सुरंगें बनाने के लिए विशेष मशीनों और तकनीक का इस्तेमाल करना पड़ेगा.
क्यों बेहद अहम है यह परियोजना?
बिलासपुर-मनाली-लेह रेल लाइन सिर्फ यात्री सुविधाओं के लिहाज से महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि देश की सुरक्षा के नजरिए से भी इसकी काफी अहमियत है. लद्दाख भारत का रणनीतिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र है. यहां तक पहुंचने के लिए फिलहाल सड़क और हवाई मार्ग पर काफी निर्भर रहना पड़ता है. मनाली-लेह हाईवे इस क्षेत्र को देश के दूसरे हिस्सों से जोड़ने वाला एक महत्वपूर्ण रास्ता है. हालांकि, ऊंचाई वाले इलाकों में बर्फबारी और खराब मौसम के कारण कई बार सड़क यातायात प्रभावित हो जाता है. सर्दियों में कुछ रास्तों पर आवाजाही भी मुश्किल हो जाती है.
ऐसे में रेलवे कनेक्टिविटी मिलने से यात्रियों के साथ-साथ सामान और जरूरी संसाधनों की आवाजाही के लिए एक अतिरिक्त विकल्प तैयार हो सकता है. रक्षा जरूरतों के लिहाज से भी यह रेल लाइन महत्वपूर्ण साबित हो सकती है. इससे लद्दाख तक जरूरी सामान, उपकरण और अन्य आपूर्ति पहुंचाने में मदद मिल सकती है.
भानुपाली-बिलासपुर रेल लाइन में आ रहीं अड़चनें
हिमालयी क्षेत्र में रेलवे परियोजनाओं को पूरा करना कितना मुश्किल है, इसका अंदाजा हिमाचल प्रदेश की भानुपाली-बिलासपुर-बेरी रेल लाइन से लगाया जा सकता है. करीब 63 किलोमीटर लंबी यह रेल लाइन राज्य में रेलवे कनेक्टिविटी मजबूत करने के लिए बनाई जा रही है. इसे आगे लेह तक प्रस्तावित रेलवे विस्तार के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जाता है.
हालांकि इस परियोजना को जमीन अधिग्रहण और राज्य सरकार की आर्थिक हिस्सेदारी से जुड़ी समस्याओं का सामना करना पड़ा है. अक्टूबर 2026 में हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने इस परियोजना के लिए जारी भूमि अधिग्रहण की शुरुआती अधिसूचना को रद्द कर दिया था. अदालत ने कहा था कि भूमि अधिग्रहण की घोषणा जारी करने की समयसीमा बढ़ाने के लिए जरूरी कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया.
कब शुरू होगा निर्माण?
बिलासपुर-मनाली-लेह रेल लाइन को लेकर सर्वे और DPR तैयार होने के बाद अब इस परियोजना के अगले चरण का इंतजार है. करीब 1.31 लाख करोड़ रुपए की अनुमानित लागत, 270 किलोमीटर लंबी सुरंगों और बेहद ऊंचाई वाले इलाके में निर्माण को देखते हुए यह परियोजना आर्थिक और तकनीकी दोनों लिहाज से बड़ी है.
अगर यह रेल लाइन भविष्य में प्रस्तावित योजना के मुताबिक बनकर तैयार होती है तो इससे लेह तक पहुंचना आसान हो सकता है. साथ ही भारत के नाम दुनिया के सबसे ऊंचे रेलवे स्टेशन का रिकॉर्ड भी दर्ज हो सकता है. यह परियोजना न केवल देश की रेलवे कनेक्टिविटी का विस्तार करेगी, बल्कि हिमालय में रेलवे इंजीनियरिंग की एक नई मिसाल भी पेश कर सकती है.




