दायरा: अपराध के दायरे में फंसता सिनेमा
डायरेक्टर मेघना गुलजार की मानें तो 'दायरा' सिर्फ एक घटना की कहानी नहीं है. इस क्राइम-थ्रिलर फिल्म के जरिए आज बात सच्ची घटनाओं पर आधारित फिल्मों की और विलेन को हीरो बनाने की मुद्दे की.
हीरो की तरह एंट्री , सिगरेट के धुएं का छल्ला , डॉयलाग के नाम पर गालियां, तेज रफ्तार और महंगी-महंगी गाड़ियां , फिर थोड़ा ससपेंस , अंधेरी काली रात , हिरोइन की डरी हुई रियलिस्टिक चाल, और फिर एक चीख…जबरदस्त डॉल्बी एटमॉस अफ्फेक्ट. यही परिभाषा है इस दौर की सच्ची घटनाओं पर आधारित फिल्मों की और हां जिस एंट्री की बात मैंने की, वो आज के समय में बनने में वाली फिल्म के हीरो की नहीं बल्कि विलेन की है . वाह क्या यू टर्न लिया है! सिनेमा ने. रियल क्राइम दिखाने के चक्कर मे कहीं रियल क्रिमिनल अप्रोच या विचार को तो जन्म देने मैं नहीं लगे हैं आज के फिल्म निर्माता.
आज बात फिल्म ‘दायरा’ के जरिए सच्ची घटनाओं पर आधारित फिल्मों के कंटेंट और विलेन को हीरो बनाने के मुद्दे पर करना चाहता हूं. जिस GenZ की हम बात करते हैं, उनकी भाषा के गिरते स्तर को देखते और सुनते हैं, कहीं उसके पीछे समाज का आईना कही जाने वाली फिल्में तो नहीं हैं. ये विषय बहस का मुद्दा बन सकता है, पर ठीक है बहस जरूरी है ऐसे विषयों पर भी. मैं अपने तर्कों के साथ इसे पटल पर रखता हूं. आप अपने विचार व्यक्त कर सकते हैं. तो चलिए परत दर परत सिनेमा की इस रील को दर्शक के चश्में से देखते हैं.
अपराध की कहानी या अपराध का ग्लैमर?
जब सिनेमा में विलेन हीरो बनने लगे, तो हमें कहानी से ज्यादा उसके असर की चिंता करनी चाहिए. सिनेमा समाज का आईना जरूर है, लेकिन आईने का काम अपराध को चमकाना नहीं, उसका चेहरा दिखाना है. जिस अपराध से समाज डरता है, अगर वही अपराध पर्दे पर स्टाइल बन जाए, तो सवाल सिर्फ फिल्म का नहीं रहता, सवाल हमारी अगली पीढ़ी का भी हो जाता है. आज हिंदी सिनेमा और ओटीटी के सामने सबसे बड़ा सवाल ये नहीं है कि अपराध पर फिल्म क्यों बन रही है. अपराध पर फिल्म बननी चाहिए. बलात्कार, हत्या, गैंगवार, भ्रष्टाचार, पुलिस व्यवस्था, न्याय व्यवस्था और अपराध की दुनिया को समझना भी सिनेमा की जिम्मेदारी हो सकती है. सवाल ये है कि हम अपराध की कहानी किस नजरिए से सुना रहे हैं? क्या हम पीड़ित की कहानी बता रहे हैं? क्या हम परिवार का दर्द दिखा रहे हैं? क्या हम जांच की मुश्किलें दिखा रहे हैं? क्या हम कानून की कमजोरियां सामने ला रहे हैं? या फिर हम अपराधी की जिंदगी को इतना रोमांचक, स्टाइलिश और बड़ा बना रहे हैं कि वो अपराधी कम और फिल्म का हीरो ज्यादा दिखाई देने लगे? यही वो जगह है, जहां आज के सिनेमा पर गंभीर बहस की जरूरत है.
किसी एक घटना की कहानी नहीं ‘दायरा’
बात करते हैं लेटेस्ट रिलीज हुई फिल्म दायरा की. करीना कपूर खान और पृथ्वीराज सुकुमारन की मेघना गुलजार निर्देशित दायरा इसी बहस को फिर सामने ले आई है. फिल्म में एक युवती के साथ रेप और हत्या के बाद पुलिस कार्रवाई, एनकाउंटर और न्याय की अलग-अलग सोच सामने आती है. पृथ्वीराज का किरदार डीसीपी रमन कुमार और करीना का किरदार डीसीपी अजूनी कोहली इस पूरे मामले को दो अलग नजरियों से देखते हैं. फिल्म का एक बड़ा सवाल है- क्या त्वरित सजा ही न्याय है? यहां एक बात साफ करना भी जरूरी है. ट्रेलर आने के बाद इसे 2019 के हैदराबाद पशु चिकित्सक के रेप-मर्डर केस से जोड़कर देखा गया था. लेकिन मेघना गुलजार ने कहा कि दायरा किसी एक घटना की सीधी कहानी नहीं है; यह देश के कई वास्तविक मामलों से प्रेरित है. और यही बात इस फिल्म को सिर्फ एक रेप केस की फिल्म कहने से अलग करती है. मेघना गुलजार ने खुद कहा है कि अपराध इस कहानी का सिर्फ बीज है, उसके बाद समाज, न्याय और व्यवस्था में जो कुछ होता है, कहानी वहां जाती है. इसलिए दायरा को लेकर सवाल यह नहीं होना चाहिए कि एक और रेप-मर्डर पर फिल्म क्यों? सवाल होना चाहिए- क्या इस बार अपराध के बाद पैदा होने वाले सवालों को पर्याप्त जगह दी गई है? और यह सवाल इसलिए भी जरूरी है क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में हिंदी सिनेमा और ओटीटी पर वास्तविक अपराधों को लेकर एक पूरा बाजार बन चुका है.
असली अपराध अब मनोरंजन का विषय क्यों बन रहा है? आज दर्शक के पास फिल्म देखने के लिए सिर्फ सिनेमाघर ही नहीं, नेटफ्लिक्स, प्राइम वीडियो, जियो हॉटस्टार, सोनी लिव, जी5 और दूसरे प्लेटफॉर्म पर हर दिन नई कहानियां आती हैं. इन प्लेटफॉर्म को ऐसा कंटेंट चाहिए जो पहले ही सेकंड से दर्शक को पकड़ ले. हत्या, रेप ,सीरियल किलर , गैंगस्टर, माफिया , पुलिस एनकाउंटर, जेल, अंडरवर्ल्ड इन शब्दों में अपने आप एक जिज्ञासा पैदा होती है. यही वजह है कि True Crime आज एक बड़ा कंटेंट जॉनर बन चुका है. नेटफ्लिक्स ने खुद ब्लैक वारंट के बारे में कहा कि यह वास्तविक घटनाओं से प्रेरित जेल ड्रामा है और True Crime ऐसा जॉनर है जिसमें उसके दर्शकों की काफी रुचि है. लेकिन यहां एक बारीक फर्क है. ‘True Crime’ और Crime Glorification एक चीज नहीं हैं. एक फिल्म अपराधी को समझने की कोशिश कर सकती है, लेकिन उसे महान बनाए बिना. एक फिल्म गैंगस्टर का जीवन दिखा सकती है, लेकिन उसके अपराध को स्टाइल स्टेटमेंट बनाए बिना. एक फिल्म रेप की घटना दिखा सकती है, लेकिन पीड़िता के दर्द को मनोरंजन का दृश्य बनाए बिना. यही फर्क हमारी जिम्मेदारी तय करता है.
हिंदी सिनेमा में अपराध की वास्तविक कहानियों की लंबी सूची है , अगर पीछे मुड़कर देखें तो ये सिलसिला नया नहीं है.
- ‘ब्लैक फ्राइडे’ ने 1993 मुंबई बम धमाकों और उनकी जांच को सामने रखा. फिल्म ने अपराधियों के साथ-साथ पुलिस, जांच और घटना के दूसरे पक्षों को भी दिखाया. लगभग 4.5 करोड़ के बजट वाली इस फिल्म का विश्वव्यापी कलेक्शन लगभग 6.78 करोड़ रहा.
- ‘शूटआउट एट लोखंडवाला’ 1991 के वास्तविक पुलिस-गैंगस्टर मुठभेड़ पर बनी थी. 18 करोड़ के आसपास की लागत वाली फिल्म ने लगभग 46 करोड़ का वर्ल्डवाइड ग्रॉस कलेक्शन किया था.
- ‘शूटआउट एट वडाला’ ने मुंबई के गैंगस्टर मान्या सुर्वे और पुलिस एनकाउंटर की कहानी को बड़े पर्दे पर रखा. करीब 49 करोड़ के बजट के मुकाबले वर्ल्डवाइड ग्रॉस कलेक्शन करीब 82.55 करोड़ रहा.
- ‘वन्स अपॉन ए टाइम इन मुंबई’ ने मुंबई अंडरवर्ल्ड की दुनिया को बेहद स्टाइलिश अंदाज में पेश किया. करीब 35 करोड़ के बजट में बनी फिल्म ने वर्ल्डवाइड लगभग 85 करोड़ की कमाई की.
- यहीं से ये सवाल और बड़ा होता है- जब अपराधी का संसार कहानी से निकलकर स्टाइल, संवाद, कपड़े, गाड़ी, संगीत और व्यक्तित्व का हिस्सा बन जाता है, तो क्या दर्शक अपराध और अपराधी के बीच का फर्क हमेशा याद रखता है?
- डैडी, जो अरुण गवली के जीवन से प्रेरित थी. फिल्म के विवरण में खुद गवली को कुछ लोगों के लिए खतरनाक गैंगस्टर और कुछ के लिए डैडी या आधुनिक Robin Hood जैसा बताया गया. 21 करोड़ के बजट वाली फिल्म लगभग कलेक्शन के मामले 15.48 करोड़ वर्ल्डवाइड ग्रॉस तक पहुंची.
- ‘हसीना पारकर’ दाऊद इब्राहिम की बहन हसीना पारकर के जीवन से प्रेरित थी. करीब 18 करोड़ के बजट के मुकाबले इसका वर्ल्डवाइड ग्रॉस कलेक्शन लगभग 9.07 करोड़ रहा.
- ‘मैं और चार्ल्स’ कुख्यात अपराधी चार्ल्स शोभराज से प्रेरित थी. 10 करोड़ के आसपास के बजट के सामने वर्ल्डवाइ ग्रॉस कलेक्शन लगभग 8.12 करोड़ रहा.
- ‘रमन राघव 2.0’ ने एक सीरियल किलर से प्रेरित कहानी को मनोवैज्ञानिक अंदाज में पेश किया. बॉक्स ऑफिस इंडिया के अनुसार करीब 10 करोड़ के बजट के मुकाबले वर्ल्डवाइड ग्रॉस कलेक्शन करीब 10.68 करोड़ रहा.
- ‘ओमेर्ता’ में राजकुमार राव ने आतंकवादी अहमद उमर सईद शेख का किरदार निभाया. यह अपराधी की मानसिकता और आतंकवाद की दुनिया को समझने की कोशिश थी, लेकिन बॉक्स ऑफिस पर फिल्म कमजोर रही. 12 करोड़ के बजट के मुकाबले वर्ल्डवाइड ग्रॉस करीब 4.5 करोड़.
- ‘स्पेशल 26’ वास्तविक घटनाओं से प्रेरित ठगी और फर्जी छापेमारी की कहानी थी. 50 करोड़ के बजट पर इसने करीब 103.6 करोड़ वर्ल्डवाइड ग्रॉस कमाई की.
- ‘नो वन किल्ड जेसिका’ ने जेसिका लाल हत्याकांड और न्याय की लड़ाई को पर्दे पर रखा. 19 करोड़ के बजट के मुकाबले इसका वर्ल्डवाइड ग्रॉस कलेक्शन करीब 45.72 करोड़ रहा.
- ‘तलवार’ ने आरुषि तलवार-हेमराज हत्याकांड की जांच को अलग-अलग जांच दृष्टिकोणों के साथ पेश किया. करीब 17 करोड़ के बजट वाली फिल्म का वर्ल्डवाइड कलेक्शन लगभग 47.18 करोड़ रहा.
- ‘द अटैक्स ऑफ 26/11’ ने मुंबई आतंकी हमले को पर्दे पर उतारा. करीब 23 करोड़ के बजट के मुकाबले वर्ल्डवाइड कलेक्शन लगभग 23.52 करोड़ रहा.
- ‘बटला हाउस’ ने 2008 के बटला हाउस एनकाउंटर के बाद उठे सवालों को कहानी का हिस्सा बनाया. 56 करोड़ के बजट पर फिल्म ने लगभग 112.88 करोड़ वर्ल्डवाइड कलेक्शन किया.
- ‘रेड’ वास्तविक आयकर छापे से प्रेरित कहानी थी. 72 करोड़ के बजट पर इसका वर्ल्डवाइड ग्रॉस कलेक्शन करीब 145.72 करोड़ रहा.
- ‘परमाणु’ अपराध की कहानी नहीं थी, लेकिन वास्तविक घटना को बड़े पर्दे पर किस तरह रोचक बनाया जा सकता है, इसका उदाहरण है. 1998 के पोखरण परमाणु परीक्षणों पर बनी फिल्म ने करीब 44 करोड़ के बजट के मुकाबले 90.89 करोड़ का कलेक्शन किया था.
- और फिर आती है ‘आर्टिकल 15, जिसने अपराध के साथ जाति, पुलिस व्यवस्था और सामाजिक भेदभाव का सवाल जोड़ा. करीब 30 करोड़ के बजट के सामने फिल्म का कलेक्शन करीब 91.8 करोड़ रहा.
यानी आंकड़े एक बात साफ करते हैं- दर्शक सिर्फ हिंसा देखने नहीं आता. वो अच्छी कहानी के लिए भी टिकट खरीदता है.
असली अपराध पर बनी वेब सीरीज का नया दौर
ओटीटी ने ‘True Crime’ को और बड़ा बना दिया. ‘दिल्ली क्राइम’ ने निर्भया कांड की जांच को पुलिस के नजरिए से दिखाया. ‘दहाड़’ सीरियल किलर साइनाइड मोहन से प्रेरित थी और महिलाओं को निशाना बनाने वाले अपराधी की कहानी को पुलिस जांच के जरिए सामने लाई.
‘इंडियन प्रीडेटर: द बुचर ऑफ दिल्ली ने चंद्रकांत झा के मामलों को दिखाया. इंडियन प्रीडेटर: द डायरी ऑफ अ सीरियल किलर’ ने एक ऐसे आरोपी की कहानी दिखाई, जिसके खिलाफ हत्या के मामले और कथित अतिरिक्त पीड़ितों से जुड़ी जांच सामने आई. हाउस ऑफ सीक्रेट्स: द बुरारी डेथ्स ने दिल्ली के बुराड़ी में एक ही परिवार के 11 सदस्यों की मौत की घटना की पड़ताल की. ‘स्कैम 1992’ ने हर्षद मेहता के आर्थिक अपराध और शेयर बाजार की उस व्यवस्था को दिखाया, जिसने हजारों-लाखों लोगों को प्रभावित किया. सोनी लिव इसे स्पष्ट रूप से true events पर आधारित बायोपिक बताता है. ब्लैक वारंट ने तिहाड़ जेल के अंदर की दुनिया और वास्तविक घटनाओं से जुड़े किस्सों को सामने रखा. यह एक पूर्व तिहाड़ जेलर की किताब पर आधारित dramatized adaptation है. यहां भी एक सवाल है- क्या हम अपराध को समझ रहे हैं या अपराधी को सेलिब्रिटी बना रहे हैं?
सबसे बड़ा खतरा: अपराधी का कूल बन जाना. किसी अपराधी को पर्दे पर दिखाना गलत नहीं है. लेकिन अगर अपराधी की एंट्री पर तालियां बजें, उसके संवाद सोशल मीडिया पर वायरल हों, उसके कपड़े फैशन बन जाएं, उसकी गाड़ी युवाओं का सपना बन जाए, उसकी बंदूक स्टाइल बन जाए, उसकी हिंसा एटीट्यूड बन जाए और उसकी कहानी का नैतिक अंत पीछे छूट जाए- तो सिनेमा को खुद से सवाल पूछना चाहिए. हमने कहानी सुनाई है या एक ब्रांड बना दिया है.
वन्स अपॉन ए टाइम इन मुंबई जैसी फिल्मों में अंडरवर्ल्ड की दुनिया को रेट्रो स्टाइल और आकर्षक प्रस्तुति मिली. डैडी में भी वास्तविक अपराधी के साथ Robin Hood वाली सामाजिक छवि का संदर्भ मिलता है. यह जरूरी नहीं कि ऐसी हर फिल्म अपराध को सही ठहरा रही हो. लेकिन दृश्य भाषा का असर कहानी के अंतिम संदेश से अलग भी हो सकता है. यही सिनेमा की सबसे बड़ी ताकत और सबसे बड़ी जिम्मेदारी है.
क्या ये रियलिज्म है?
गालियां, एडल्ट सीन और हिंसा, क्या ये रियलिज्म है? आज फिल्मों और वेब सीरीज में गालियां इतनी सामान्य हो गई हैं कि कई बार लगता है कि बिना गाली के किरदार बोल ही नहीं सकता. हर दूसरे संवाद में अपशब्द. हर तीसरे सीन में हिंसा. और कई बार कहानी से ज्यादा सेक्सुअल कंटेंट. क्या हर बार ये जरूरी है? क्या हर पुलिस वाला गाली देकर ही असली पुलिस वाला लगेगा? क्या हर गैंगस्टर का संवाद गाली के बिना प्रभावी नहीं हो सकता? क्या हर कहानी में एडल्ट सीन डालने से वो ज्यादा मैच्योर हो जाती है? रियलिस्टिक होना और अश्लील होना एक ही बात नहीं है. सिनेमा में गाली तभी होनी चाहिए जब वो कहानी या किरदार के लिए जरूरी हो. लेकिन जब गाली खुद प्रचार का हिस्सा बन जाए, तब भाषा पर सवाल उठना स्वाभाविक है.
सवाल उठता है- क्या क्राइम स्टोरीज बननी ही बंद हो जाएं? नहीं. बिल्कुल नहीं. क्राइम स्टोरी जरूरी है, लेकिन क्राइम स्टोरी में अपराधी सबसे बड़ा स्टार क्यों हो? हम अपराधी की कहानी की जगह पीड़ित की कहानी लिख सकते हैं. जांच अधिकारी की कहानी लिख सकते हैं. एक छोटे शहर के ईमानदार पुलिसकर्मी की कहानी लिख सकते हैं. उस मां की कहानी लिख सकते हैं, जिसने न्याय के लिए दस साल अदालत के चक्कर लगाए. उस वकील की कहानी लिख सकते हैं जिसने बिना फीस लिए केस लड़ा. उस शिक्षक की कहानी लिख सकते हैं जिसने अपराध की तरफ बढ़ते बच्चे को वापस स्कूल पहुंचाया. उस पत्रकार की कहानी लिख सकते हैं जिसने किसी शक्तिशाली अपराधी के खिलाफ सच लिखा. कहानी की दुनिया इतनी बड़ी है कि हमें बार-बार अपराधी के कमरे में जाने की जरूरत नहीं.
’12th फेल’ क्यों अलग?
’12th फेल’ ने साबित किया- अच्छी कहानी अपराधी के बिना भी बिकती है. 2023 की यह फिल्म, इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. इस फिल्म में कोई गैंगस्टर नहीं था. कोई सीरियल किलर नहीं था. कोई हिंसक विलेन नहीं था. कहीं कोई अश्लील कंटेंट नहीं था. गाली बेचने वाला प्रचार नहीं था. ये एक ऐसे लड़के की कहानी थी, जो 12वीं में फेल हुआ, संघर्ष करता रहा और आखिरकार IPS अधिकारी बना. लगभग 20 करोड़ की लागत वाली इस फिल्म ने करीब 70 करोड़ वर्ल्डवाइड ग्रॉस कलेक्शन किया. भारत में इसका नेट कलेक्शन लगभग 56-57 करोड़ रहा. और इसकी सफलता सिर्फ सिनेमाघर तक नहीं रही. Hotstar पर रिलीज के तीन दिन के अंदर इसे 2023 की उस प्लेटफॉर्म की सबसे ज्यादा देखी गई फिल्मों में बताया गया. यह आंकड़ा हिंदी सिनेमा के लिए बहुत बड़ा संदेश है. दर्शक अच्छी कहानी से थका नहीं है. दर्शक सिर्फ हिंसा नहीं चाहता. दर्शक सिर्फ स्टार नहीं चाहता. दर्शक अच्छी कहानी चाहता है. समस्या शायद कहानी में नहीं है. समस्या उस सोच में है जो मानती है कि अगर कहानी में बड़ा अपराधी नहीं है तो दर्शक नहीं आएगा.
आज के दौर में निर्देशक तिग्मांशु धूलिया की बातें खास तौर पर ध्यान खींचती हैं. उन्होंने हाल ही में कहा कि आज फिल्मों में कहानियां कम होती जा रही हैं और ‘हर फिल्म एक फिक्शनल बायोपिक जैसी लगने लगी है. यही फर्क महत्वपूर्ण है. अपराधी को समझना और अपराधी को महान बनाना- दो अलग बातें हैं. हमें हीरो कौन है यह फिर से तय करना होगा . शायद हिंदी सिनेमा को अब एक नया सवाल पूछना चाहिए- हमारी फिल्मों का असली हीरो कौन है? वो अपराधी जिसने 20 लोगों को मारा? या वो पुलिसकर्मी जिसने 20 लोगों की जान बचाई? वो आदमी जिसने सिस्टम को लूटा? या वो शिक्षक जिसने 20 बच्चों को पढ़ाकर उनका जीवन बदल दिया? वो व्यक्ति जिसने डर पैदा किया? या वो महिला जिसने डर के बावजूद अदालत का दरवाजा खटखटाया? अगर सिनेमा समाज को कहानी देता है तो उसे यह भी तय करना होगा कि वो किसे यादगार बना रहा है. क्योंकि अपराधी की मौत के बाद भी उसकी फिल्मी छवि जीवित रह सकती है. और यही सबसे बड़ा खतरा है.
कहानियों की कमी नहीं
सिनेमा बनानो वालों को यह तय करना होगा कि वह समाज को क्या दे रहे हैं. हमारे पास कहानियों की कमी नहीं है. भारत में हर शहर एक कहानी है. हर गांव में एक कहानी है. हर सरकारी स्कूल में कहानी है. हर रेलवे स्टेशन पर कहानी है. हर छोटे कारोबारी की जिंदगी में कहानी है. हर किसान में कहानी है. हर खिलाड़ी में कहानी है. हर वैज्ञानिक में कहानी है. हर सैनिक के परिवार में कहानी है. हर संघर्ष करते विद्यार्थी में कहानी है. फिर हम बार-बार उसी अपराधी के पास क्यों लौटते हैं? क्योंकि अपराध बिकता है? तो हमें यह भी देखना होगा कि अच्छी कहानी को बेचने की कोशिश कितनी की गई. 12th फेल ने दिखाया कि कम बजट की कहानी भी दर्शक पकड़ सकती है. आर्टिकल 15 ने दिखाया कि सामाजिक मुद्दे वाली फिल्म भी कमाई कर सकती है. नौ वन किल्ड जेसिका ने दिखाया कि न्याय की लड़ाई भी कॉमर्शियल सिनेमा बन सकती है. परमाणु ने दिखाया कि वास्तविक इतिहास को भी थ्रिलर की तरह बताया जा सकता है.
आखिर में सवाल फिल्मकारों से नहीं, हम सबसे है , अपराध पर फिल्म बनाना अपराध नहीं है. रेप पर फिल्म बनाना गलत नहीं है. सीरियल किलर की कहानी बताना भी गलत नहीं है. गैंगस्टर की दुनिया दिखाना भी गलत नहीं है. लेकिन सवाल है- हम कैमरा किसके चेहरे पर रखते हैं? अपराधी के चेहरे पर? या पीड़ित के आंसू पर? गन पर? या उस परिवार पर जिसने अपना बेटा खोया? अपराधी की कार पर? या उस पुलिसकर्मी पर जिसने सालों जांच की? उसकी प्रेम कहानी पर? या उसके अपराध के कारण टूटे परिवारों पर? अगर हम अपराधी को दिखाएं तो उसके अपराध का सच भी दिखाएं. अगर उसकी कहानी बताएं तो उसके पीड़ितों को भी कहानी दें. अगर उसकी जिंदगी को सिनेमैटिक बनाएं तो यह भी बताएं कि असल जिंदगी में उसके अपराध ने कितने घर बर्बाद किए. क्योंकि सिनेमा सिर्फ दो घंटे की कहानी नहीं है. वह किसी की भाषा बन सकता है, किसी का फैशन बन सकता है, किसी का सपना बन सकता है, और कभी-कभी किसी की सोच का हिस्सा भी बन सकता है.
इसलिए अगली बार जब हम किसी अपराधी को पर्दे पर कूल बनाएं, तो एक पल के लिए ये भी सोचें कि क्या हमारे पास इससे बेहतर हीरो नहीं हैं? भारत में करोड़ों लोग हैं जिनकी जिंदगी संघर्ष, ईमानदारी, मेहनत और उम्मीद से भरी है. उनकी कहानियां अभी बाकी हैं. शायद अब हिंदी सिनेमा को उन्हीं कहानियों की तरफ लौटना चाहिए. क्योंकि समाज को हर बार एक नया अपराधी नहीं चाहिए. समाज को नए नायक चाहिए. और सिनेमा के पास उन नायकों को खोजने की ताकत भी है और जिम्मेदारी भी.




