अगर 6 महीने बंद रहा होर्मुज तो कैसे होंगे हालात, क्या दुनिया झेल पाएगी ये झटका?
होर्मुज महज एक समुद्री रास्ता नहीं बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था की धुरी है, जहां अब समुद्री माइन्स का बड़ा खतरा है. अमेरिकी की रिपोर्ट के अनुसार, युद्ध रुकने पर भी इन माइन्स को हटाने में कम से कम 6 महीने लगेंगे. अगर ऐसा होता है तो इससे दुनिया की तेल आपूर्ति ठप हो सकती है. इससे वैश्विक अर्थव्यवस्था को भारी झटका लगने की आशंका है.
होर्मुज स्ट्रेट सिर्फ़ एक समुद्री रास्ता नहीं है बल्कि ये दुनिया की अर्थव्यवस्था की धड़कन है. दुनिया के हर 5 में से एक जहाज हजारों टन कच्चा तेल लेकर इस रास्ते से गुजरता है. अब ज़रा सोचिए, अगर ये धड़कन 6 महीने के लिए काम करना बंद कर दे तो क्या होगा. एक अमेरिकी अखबार ने होर्मुज को लेकर चौंकाने वाला दावा किया है. इसके मुताबिक अमेरिकी रक्षा विभाग पेंटागन ने अमेरिकी सांसदों को साफ बता दिया है कि होर्मुज स्ट्रेट से बारूदी माइन्स को हटाने में कम से कम 6 महीने लगेंगे. ये तब होगा जब युद्ध पूरी तरह रुक जाए. पेंटागन के इस बयान से हड़कंप मचा है, जिसके बाद सबसे ज्यादा परेशान डोनाल्ड ट्रंप हैं.
अमेरिकी अखबार के दावे के साथ ही कई सवालों ने भी जन्म ले लिया है. सवाल है- क्या सच में होर्मुज से 6 महीने तेल सप्लाई बंद रहेगी? क्या दुनिया 6 महीने तक इस झटके को झेल पाएगी? होर्मुज से बारूदी माइन्स हटाने में 6 महीने का समय क्यों चाहिए? इन सभी सवालों के जवाब जानने से पहले आपको बताते हैं कि अमेरिकी अखबार ने अपने दावे में क्या कहा है.
माइंस हटाने में लग सकते हैं 6 महीने तक
रिपोर्ट के मुताबिक, होर्मुज से माइंस हटाने में 6 महीने तक लग सकते हैं. माइंस हटाने के लिए ऑपरेशन युद्ध खत्म होने के बाद शुरू होगा. अमेरिकी कांग्रेस को गोपनीय ब्रीफिंग में पेंटागन ने ये जानकारी दी है. अनुमान के मुताबिक, 20 से ज्यादा माइंस बिछाई गई हैं. कुछ माइंस GPS तकनीक से तैरती हैं जिससे उनका डिटेक्शन बेहद मुश्किल है. छोटी नावों के जरिए माइंस बिछाने की भी आशंका जताई गई है. हेलिकॉप्टर, ड्रोन और डाइवर्स से क्लियरेंस ऑपरेशन संभव है. लंबी प्रक्रिया की वजह से वर्ष 2027 तक तेल और गैस की कीमतें ऊंची रहने का खतरा है.
इस खबर का असर दुनिया की आधी आबादी पर पड़ सकता है. ये मामला ग्लोबल इकॉनॉमिक वॉर है. इसलिए बारूदी माइन्स वाली ये ख़बर पूरी दुनिया की फिक्र बढ़ा रही है. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में बिछी बारूदी माइन्स के बारे में जानने से पहले आइए ये समझ लेते हैं कि आखिर बारूदी माइन्स होती क्या हैं? दरअसल, सी-माइन्स पानी में छिपे बम की तरह होती हैं.
कुछ माइन्स समुद्र के नीचे रखी जाती हैं
जहाजों को नुकसान पहुंचाने के लिए बनाई जाती हैं. ये समुद्र के तल से रस्सी से बंधी रहती हैं. ये पानी की सतह के पास 5 से 10 मीटर ऊपर तैरती रहती हैं. कुछ सी-माइन्स समुद्र के नीचे रखी जाती हैं. ये 100 किलो से 500 किलो विस्फोटक रख सकती हैं. अब जानते हैं कि इन सी-माइन्स को आखिर समंदर में कैसे बिछाया जाता है.
इसके लिए ईरान छोटी-तेज रफ्तार वाली नावों का इस्तेमाल करता है. हर छोटी नाव 2 से 3 माइन्स ले जा सकती है. रात में या छिपकर बोट्स जल्दी-जल्दी माइन्स गिरा देती हैं. कुछ माइन्स को सबमरीन्स से भी बिछाया जाता है. कुछ माइन्स मछली पकड़ने वाली नाव या सिविलियन बोट से भी गिराई जाती हैं. कभी-कभी माइन्स को रॉकेट या मिसाइल से भी बिछाया जाता है.
आखिर सी माइन्स काम कैसे करती हैं?
- पहले उस जगह का चुनाव जहां माइन्स बिछाई जानी हैं
- जहाज, पनडुब्बी या विमान से माइन्स बिछाई जाती हैं
- बिछने के बाद माइन्स का सेंसर मोड सक्रिय हो जाता है
- जहाज की रेंज में आते ही सेंसर उसे डिटेक्ट कर लेता है
- जहाज के पास आते ही माइन्स ट्रिगर होकर फट जाती हैं
समुद्री विश्लेषकों का अनुमान है कि ईरान के पास लगभग 2 हजार से 6 हजार बारूदी सुरंगों का भंडार है, जिसके बड़े हिस्से का उत्पादन वो ईरान में ही करता है. ये हथियार आम तौर पर कई कैटेगरी में आते हैं, जो इस बात पर निर्भर करते हैं कि वो अपने टारगेट पर किस तरह हमला करते हैं. होर्मुज को लेकर भी कहा जा रहा है कि यहां भी ईरान ने इसी तरह की कई बारूदी माइन्स बिछा रखी हैं.
सीबेड और मूर्ड माइन
इसें पहली है सीबेड माइन. ये समुद्र के तल पर रहती हैं. ये ऊपर जहाज के गुजरने पर हमला करती है. दूसरी है मूर्ड माइन. ये समुद्र की तलहटी से रस्सी या चेन के जरिए बंधी होती है. ये माइन्स शिप के टकराने या पास आने पर फटती है. तीसरी है ड्रिफ्टिंग माइन. ये समुद्र की लहरों के साथ बहती है. जहाज से टकराते ही इनमें विस्फोट हो जाता है.
चौथी है रॉकेट-प्रोपेल्ड माइन. ये समुद्र की तलहटी में छिपी रहती है. ये ऊपर जाकर जहाज के पास ब्लास्ट करती है. आधुनिक युद्ध में नेवल माइन्स को सबसे किफायती हथियार बताया गया है. फिलाडेल्फिया में मौजूद फॉरेन पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट के मुताबिक आधुनिक सी माइन्स बनाने में सिर्फ 10 हजार डॉलर के आसपास खर्च आता है लेकिन ये माइन्स आर्थिक और रणनीतिक रूप से कई गुना ज्यादा नुकसान पहुंचा सकती हैं.



