Film Ikkis: धर्मेंद्र के आखिरी फिल्म की ‘ताकत’ ही न बन जाए ‘कमजोरी’, 5 खामियां फिल्म को डुबाने के लिए काफी हैं

Film Ikkis: धर्मेंद्र के आखिरी फिल्म की ‘ताकत’ ही न बन जाए ‘कमजोरी’, 5 खामियां फिल्म को डुबाने के लिए काफी हैं

Ikkis Critical Analysis: अगर आप सिनेमा के पारखी हैं और एक ऐसी कहानी देखना चाहते हैं जो आपको सोचने पर मजबूर कर दे, तो 'इक्कीस' आपके लिए है. लेकिन अगर आप सिर्फ एक मास और मसाले वाली फिल्म की तलाश में हैं, तो यहां आपका रॉन्ग नंबर आ लग सकता है.

Ikkis Critical Analysis: थ्रिलर फिल्मों के उस्ताद श्रीराम राघवन एक ऐसी कहानी लेकर आए हैं, जो सरहद की धूल और टैंकों के शोर के बीच दबे उन जज्बातों को बाहर निकालती है, जिन्हें अक्सर बॉलीवुड की वॉर फिल्मों में नजरअंदाज कर दिया जाता है. ‘इक्कीस’ परमवीर चक्र विजेता अरुण खेत्रपाल की शहादत की गाथा है. एक तरफ जहां ‘धुरंधर’ जैसी फिल्में धाकड़ एक्शन और शोर-शराबे से बॉक्स ऑफिस हिला रही हैं, वहीं राघवन ने अपनी फिल्म के लिए सादगी और गहराई का रास्ता चुना है. लेकिन क्या ये फिल्म हर किसी के गले उतरेगी? क्या इसमें सिर्फ खूबियां हैं या कुछ ऐसी कमियां भी हैं जो फिल्म का मजा किरकिरा करती हैं? आइए जानते हैं ‘इक्कीस’ का पूरा कच्चा-चिट्ठा.

1. कछुए की चाल जैसी ‘पेसिंग’: श्रीराम राघवन का स्टाइल हमेशा से ‘स्लो-बर्न’ रहा है, यानी कहानी धीरे-धीरे पकती है. लेकिन ‘इक्कीस’ में ये स्टाइल कभी-कभी दर्शकों के सब्र का इम्तिहान लेने लगता है. फिल्म का पहला हिस्सा किरदारों को गढ़ने और पुरानी यादों (नॉस्टैल्जिया) में इतना वक्त बिता देता है कि कहानी की रफ्तार रेंगने लगती है. अगर आप ‘बॉर्डर’ जैसी तेज रफ्तार फिल्म की उम्मीद में जा रहे हैं, तो शुरुआत में आपको थोड़ी मायूसी हो सकती है.

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2. उलझा देने वाली एडिटिंग

फिल्म लगातार 1971 (जंग का दौर) और 2001 (वर्तमान) के बीच झटके खाती रहती है. हालांकि निर्देशक का मकसद बाप-बेटे के समानांतर सफर को दिखाना था, लेकिन ये ‘जंप कट्स’ कई बार इतने अचानक होते हैं कि दर्शक थोड़ा भटका हुए महसूस करने लगता है. समय का ये हेर-फेर कभी-कभी फिल्म के इमोशनल फ्लो को बीच में ही तोड़ देता है.

3. फीका संगीत

श्रीराम राघवन की पिछली फिल्मों (जैसे ‘अंधाधुन’) का संगीत फिल्म की जान होता था, लेकिन ‘इक्कीस’ यहां मात खा गई. बैकग्राउंड स्कोर तनाव पैदा करने में तो कामयाब है, लेकिन गाने किसी काम के नहीं लगते. फिल्म खत्म होने के बाद आप एक भी गाना गुनगुनाते हुए बाहर नहीं निकलेंगे. ये गाने इस फिल्म पर थोपे हुए से महसूस होते हैं.

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4. एंटी-क्लाइमेक्स का रिस्क

फिल्म का अंत ट्रेडिशनल नहीं है. यहां कोई हीरो की शानदार जीत का जश्न नहीं मनाया गया, न ही जीत के साथ हुई हीरो की ट्रैजिक एंडिंग पर सिनेमा को खत्म किया गया है. एक फ्लैट और पॉजिटिव एंडिंग पर फिल्म खत्म होती है. उन दर्शकों के लिए, जिन्हें फिल्मों में सीटियां बजाने वाले अंत की आदत है, ये क्लाइमेक्स थोड़ा ‘अधूरा’ या फीका लग सकता है.

5. ‘मास’ ऑडियंस के लिए नहीं है ये फिल्म

‘इक्कीस’ एक मैच्योर सिनेमा है/ इसमें न तो पाकिस्तान को गालियां दी गई हैं और न ही चीख-चीख कर डायलॉग बाजी की गई है. यही वजह है कि ‘फ्रंट-बेंचर्स’ या वो दर्शक जिन्हें सिर्फ सिनेमा देखते हुए तालियां और सीटियां बजाना पसंद है, उन्हें फिल्म थोड़ी बोर लग सकती है. ये आत्मा को छूने वाली फिल्म है, सीटियां बजवाने वाली नहीं.

‘इक्कीस’ एक संवेदनशील वॉर बायोपिक है. ये धमाकों से ज्यादा इमोशंस को महत्व देती है. ये एक युवा शहीद को दी गई सच्ची श्रद्धांजलि है और साथ ही धर्मेंद्र जैसे दिग्गज कलाकार की आखिरी शानदार विदाई भी. लेकिन इसे समझना हर किसी के बस की बात नहीं है. कम शब्दों में कहे तो जो बातें फिल्म की ताकत है, वही इसकी सबसे बड़ी कमजोरी भी साबित हो सकती है.