करीना कपूर की ‘Daayra’ में दिलेरी की दलील, न्याय के लिए चाहिए साइलेंट सिंघम?
मेघना गुलज़ार की दायरा वैसे तो एक धीमी और गंभीर क्राइम थ्रिलर है लेकिन इसका हीरो इंस्टैंट जस्टिस का हिमायती है. फिल्म पृथ्वीराज सुकुमारन और करीना कपूर के किरदारों के बहाने नई बहस छेड़ती है.
मेघना गुलज़ार का मानना है कि वह दर्शकों पर प्रभाव जमाने में विश्वास नहीं रखतीं. यानी वह एक डायरेक्टर के दायरे में रहना पसंद करती हैं ना कि एक्टिविज्म में. फिल्म का कथन उनके लिए ज्यादा महत्वपूर्ण है. ऐसा उन्होंने अपनी पूर्व की फिल्मों से साबित भी किया है. लेकिन जब हम उनकी हालिया फिल्म दायरा देखते हैं तो उनकी पेशकश उसी दायरे या खांचे की नए सिरे से व्याख्या करने लगती है. फिल्म के एक सीन में हीरो पृथ्वीराज सुकुमारन से करीना कपूर करती हैं- लॉ का एक फ्रेम है…जिसके दायरे में मैं काम करती हूं, जिस पर सुकुमारन की दलील है- और मैं दायरे में काम नहीं करता, पुलिस ने अपनी ड्यूटी निभाई, वहीं करीना तर्क देती है- लॉ की तो अभी तक बारी भी नहीं आई थी.
मसला बलात्कार के आरोपियों के एनकाउंटर से जुड़ा है. अपराध, कानून और सज़ा के दायरे के उल्लंघन की ये कहानी वाकई बहुत रोमांचक है और बहसपरक भी. फिल्म का मिजाज मानो सारे परंपरागत पहलुओं का एनकाउंटर करता है. दायरा से बाहर निकलने में दिलेरी की जरूरत होती है- कोर्ट से न्याय मिलने में देरी लगती है, अपराधी देरी का फायदा उठाते हैं, पहले सज़ा कम कराने की कोशिश करते हैं और फिर लंबी अवधि तक लंबी बहस के बाद अंत में छूट भी सकते हैं. मेघना गुलज़ार की दायरा में इसी मुद्दे को गंभीरता से उठाया गया है, जहां बताया गया है कि कभी कभी इन्स्टैंट जस्टिस की भी अपनी मजबूरी होती है.
पृथ्वीराज सुकुमारन एक साइलेंट ‘सिंघम’
वास्तव में दायरा एक गंभीर सस्पेंस थ्रिलर है और डीसीपी रमन कुमार के रोल में पृथ्वीराज सुकुमारन साइलेंट ‘सिंघम’ प्रतीत होते हैं. वह जनता का आक्रोश, मीडिया ट्रायल, पीड़ित परिवार का दर्द और अपने अंदर के जज्बात के दबाव में है. वहीं डीसीपी अजूनी कोहली के रोल में करीना कपूर उस दायरे को मेंटेन करने वाली किरदार हैं जिनके जज पिता की कोर्ट परिसर में ही गोली मार दी गई, फिर भी वह कानूनी प्रक्रिया से गुनहगार को सजा दिलाने में यकीन करती है.
वैसे फिल्म की मूल कहानी में इन दोनों बड़े किरदारों का टकराव का मुद्दा भी अहम नहीं है. यह टकराव स्वाभाविकता से अपनी जगह आमने-सामने होता है. अजूनी कोहली इक्कीस साल की युवती के साथ हुए सामूहिक बलात्कार और हत्या के अभियुक्तों के एनकाउंटर की जांच में जुटी है. और स्थानीय पुलिस की टीम, साथ ही डीसीपी रमन कुमार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाती हैं. इस तरह फिल्म में दो परस्पर विरोधी विचार साथ-साथ चलते हैं. दोनों विचार अपराधियों से निपटने के लिए ही हैं लेकिन एक त्वरित फैसले का हिमायती है तो दूसरा न्यायिक प्रक्रिया के साथ.
हैदराबाद सामूहिक दुष्कर्म कांड से प्रेरित
गौरतलब है कि दायरा फिल्म की कहानी का आधार साल 2019 में हैदराबाद में हुई एक जघन्य सामूहिक दुष्कर्म की वारदात से प्रेरित है. उस घटना के आरोपियों को भी पुलिस ने एनकाउंटर में मार गिराया था. उस वारदात ने दिल्ली के निर्भया कांड की याद दिलाते हुए पूरे देश को झकझोर दिया था. जनता आक्रोश में थी. सोशल मीडिया और न्यूज़ मीडिया पर कोहराम मचा था- जिसके बाद जब पुलिस मुठभेड़ में आरोपी मारे गए तो उसी आक्रोशित जनता में खुशी की लहर दौड़ गई.
दायरा की शुरुआत भी उसी किस्म के जश्न से होती है. इसके बाद फिल्म फ्लैशबैक में जाती है. मेघना गुलज़ार के साथ इस फिल्म को सीमा अग्रवाल और यश केसवानी ने मिलकर लिखा है. लेखन और निर्देशन का तालमेल अच्छा दिखता है. फिल्म इस मायने में गंभीर और विचारणीय हो जाती है कि यहां केवल डीसीपी कुमार का कानून का दायरा तोड़ने वाला साइलेंट सिंघम वाला रूप ही नहीं दिखाया बल्कि कानून की रक्षा करने वाली जांच अधिकारी की चिंता भी दर्ज की गई है-ठीक उसी तरह से जैसे कि हैदराबाद एनकाउंटर के समय भी जहां बहुत से लोग जश्न मना रहे थे तो दूसरी ओर बहुत से लोग मानवाधिकार का मुद्दा भी उठा रहे थे.
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करीना का रोल छोटा है किंतु प्रभावी
बतौर निर्देशक-लेखक मेघना और उनकी टीम ने फिल्म के क्राइम थ्रिलर वाले टेंपरामेंट को शुरू से अंत तक बनाए रखा है. यहां दृश्यम मार्का सस्पेंस व थ्रिल पैदा करने वाला ड्रामा नहीं है लेकिन सुकुमारन की सादगी भरी संलग्नता उसके चेहरे की गंभीरता से झलकती है वहीं जब करीना कपूर मुस्कराते हुए हर सवाल करती है तो ऐसा लगता है उसे पहले से एनकाउंटर का सारा सच मालूम है. करीना का रोल छोटा है लेकिन अपने रोल में वह परफेक्ट है.
गौरतलब है कि मेघना ने अपने पिता की फिल्मोग्राफी की स्टाइल से अलग छवि बनाई है. राज़ी, तलवार, छपाक या फिर सैम बहादुर जैसी फिल्मों से उन्होंने एक परंपरागत महिला वाली फिल्मकार वाली छवि के दायरे में भी नहीं रहना चाहतीं. अब जब वह दायरा लेकर आती हैं तो बलात्कार के आरोपियों के एनकाउंटर और कानून की सीमा रेखा की बात ही नहीं करती बल्कि पुलिस सिस्टम के भीतर गैरजिम्मेदारों को भी बेपर्दा करती हैं, जिसकी वजह से ऐसी जघन्य वारदातें होती हैं.
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सिस्टम के सामने फिल्म एक सवाल है
फिल्म अपने तेवर में सिस्टम के सामने खुल कर सवाल रखती है कि किसी ही जघन्य अपराध की सजा में आखिर कितना समय लगता चाहिए या फिर उसे कैसी सजा मिलनी चाहिए. समाज को कुमार जैसा साइलेंट सिंघम चाहिए या परंपरागत तरीके से कानूनी दायरे के भीतर न्याय मिलते रहना चाहिए?




