अब सुलह नहीं, सीधे युद्ध… अमेरिका और ईरान फिर होंगे आमने-सामने? जानें क्यों नहीं बन रही बात

अब सुलह नहीं, सीधे युद्ध… अमेरिका और ईरान फिर होंगे आमने-सामने? जानें क्यों नहीं बन रही बात

ईरान और अमेरिका के बीच सीजफायर के चलते युद्ध तो नहीं हो रहा है, लेकिन तनाव की स्थिति बनी हुई है. न्यूयार्क टाइम्स के मुताबिक, अमेरिका चाहता है कि परमाणु प्रोग्राम शुरूआती बातचीत का हिस्सा हो. जबकि ईरान अभी इस पर बात नहीं करना चाहता.

ईरान और अमेरिका के बीच सीजफायर के चलते युद्ध तो नहीं हो रहा है, लेकिन तनाव की स्थिति बनी हुई है. दोनों तरफ से जुबानी हमले जारी हैं. इसी वजह से एक दिन समझौते की संभावनाएं दिखने लगती है. तो अगले दिन फिर से युद्ध वाली आशंका बढ़ जाती है. ईरान और अमेरिका के बीच सीधी बातचीत फिलहाल अटकी हुई है. हालांकि अन्य देश इनके बीच समझौता कराने में जुटे हुए हैं. लेकिन अभी तक सफलता नहीं मिल सकी है.

बताया जाता है कि इसके पीछे की सबसे बड़ी वजह है ईरान की परमाणु वाली जिद. संवर्धित यूरेनियम सौंपने और परमाणु कार्यक्रम रोकने की शर्त पर ईरान पीछे हटने को तैयार नहीं है. ईरान की तरफ से बातचीत का जो नया प्रस्ताव दिया गया, उसमें भी बात यूरेनियन पर भी अटकी हुई है. दरअसल ईरान की तरफ से बातचीत के लिए 3 चरण वाला एक प्रस्ताव दिया गया था. जिसको लेकर ट्रंप ने व्हाइट हाउस के सिचुएशन रूम में अपने सहयोगियों के साथ बैठक की. इस बैठक में ईरान का प्रस्ताव सुनकर ट्रंप भड़क गए और उन्होंने इस शांति प्रस्ताव को खारिज कर दिया.

ईरान की नियत पर ट्रंप ने उठाए सवाल

ईरान ने सबसे पहली शर्त रखी थी कि अमेरिका नाकाबंदी को खत्म करे. इसी के बाद बातचीत आगे बढ़ाई जाएगी. इसके अलावा ईरान ने स्थायी रूप से युद्ध खत्म करने की बात कही. हांलाकि ट्रंप का मानना है कि इस प्रस्ताव के पीछे ईरान की नीयत ठीक नहीं है. ईरान ने ये ऑफर दिया कि अगर अमेरिका की नाकाबंदी हटा ली जाए तो होर्मुज स्ट्रेट को पहले की तरह खोल दिया जाएगा. लेकिन असली मामला संवर्धित यूरेनियम को लेकर बिगड़ा है. ईरान ने कहा कि बातचीत के दौरान परमाणु प्रोग्राम पर कोई बात नहीं होगी. लेकिन अमेरिका परमाणु प्रोग्राम को ही रेडलाइन बता रहा है.

अमेरिका और ईरान में क्यों बिगड़ रही बात?

न्यूयार्क टाइम्स के मुताबिक, अमेरिका चाहता है कि परमाणु प्रोग्राम शुरूआती बातचीत का हिस्सा हो. जबकि ईरान अभी इस पर बात नहीं करना चाहता. अमेरिका मीडिया की खबरों के मुताबिक ट्रंप सरकार का मानना है कि अगर बिना परमाणु कार्यक्रम का मामला सुलझाए होर्मुज खोला तो बातचीत में अमेरिकी पक्ष कमजोर हो जाएगा. इसलिए दोनों का हल एक साथ ही निकाला जाना चाहिए. अमेरिका इस बात को समझ रहा है कि नाकाबंदी की वजह से ईरान पर दबाव है. इसकी वजह से तेल टैंकर ना तो ईरानी बंदरगाहों से निकल पा रहे हैं. और ना ही आने वाले जहाज ओमान की खाड़ी पार कर ईरानी बंदरगाहों तक पहुंच रहे हैं. इसलिए ईरान में हालत बिगड़ सकते हैं.

US नाकाबंदी रही जारी तो ईरान के तेल के कुएं होंगे बंद

अमेरिका की नाकाबंदी पिछले 15 दिन से जारी है. ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक अगर ये नाकाबंदी 13 दिन और जारी रही तो ईरान को तेल के कुएं बंद करने पड़ सकते हैं. अगर एक बार 72 घंटों से ज्यादा तेल के कुएं बंद किए तो फिर उन्हें दोबार शुरू करने में महीनों का वक्त लग सकता है. इससे भविष्य में ईरान का तेल उत्पादन प्रभावित होगा. यही डर ईरान पर दबाव बढ़ा रहा है. इसके अलावा ईरान में आने वाले अनाज और दूसरे जरूरी सामान की आपूर्ति भी प्रभावित हो रही है. आशंका है कि अगर यही स्थिति रही तो ईरान में जरूरी चीजों की कीमतें बेतहाशा बढ़ सकती हैं. अमेरिका नाकाबंदी के बीच चीन और रूस से मदद आना भी मुश्किल नजर आ रहा है.

होर्मुज स्ट्रेट एक तरह से आर्थिक परमाणु हथियार: रूबियो

अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रूबियो का कहना है कि होर्मुज स्ट्रेट एक तरह से आर्थिक परमाणु हथियार है जिसका इस्तेमाल ईरान दुनिया के खिलाफ करने की कोशिश कर रहा है. वे दुनिया की ऊर्जा को बंधक बनाने का दावा कर रहे हैं. सोचिए अगर उन्हीं लोगों के पास परमाणु हथियार होता तो क्या होता. वहीं ईरान के राजनेता महमूद नबावियन ने बताया कि बातचीत व्यर्थ है हमें अमेरिका को नीचा दिखाना होगा. हमने एक ग्राम भी उच्च-संवर्धित यूरेनियम हटाने पर सहमति नहीं दी. ईरान को अपने शस्त्रागार को फिर से भरने के लिए युद्धविराम की आवश्यकता थी.

UN अमेरिकी प्रतिनिधि और डो हंग वियत ईरान पर क्या बोले?

UN में अमेरिकी प्रतिनिधि माइक वाल्ट्ज का कहना है कि ईरान के पास होर्मुज स्ट्रेट से खेलने का कोई अधिकार नहीं है. ईरान को इसे सौदेबाजी के हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रहा है, ताकि उसकी अवैध परमाणु महत्वाकांक्षा पूरी हो सके. वहीं एनपीटी समीक्षा सम्मेलन अध्यक्ष डो हंग वियत का कहना है कि परमाणु शस्त्रागारों का आधुनिकीकरण और विस्तार तेजी से हो रहा है. प्रमुख शक्तियों द्वारा अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन और क्षेत्रीय देशों के बीच अविश्वास का स्तर लगातार बढ़ रहा है. ये सब मिलकर स्थिति को बेहद गंभीर बना रहे हैं.

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