Jailer 2 Movie Review: थलाइवा का वही पुराना स्वैग और गोलियों की तड़तड़ाहट, जानिए क्या नेल्सन का ये नया दांव फिर कर पाया कमाल?
रजनीकांत की फिल्म जेलर 2 थियेटर में एंट्री कर चुकी है. इसका पहला पार्ट सुपरहिट रहा था. जानिए क्या रजनीकांत का 75 साल वाला स्टारडम इस बार भी थिएटर में सीटी बजवा पाता है.
हिंदूस्तान में सिनेमा के दो रूप हैं, एक वो जहां कहानी और अदाकारी के तराजू पर फिल्म तौली जाती है, और दूसरा वो जहां सिर्फ एक शख्स परदे पर चश्मा घुमा दे तो पूरा हॉल स्टेडियम बन जाता है. रजनीकांत अब उस मुकाम पर हैं जहां उन्हें अपनी एक्टिंग साबित करने की कोई मजबूरी नहीं है. उम्र के 75वें पड़ाव पर पहुंचकर भी जब वो स्लो मोशन से चलते हुए सिगार सुलगाते हैं, तो आगे खड़े 25 साल के छैल-छबीले हीरो भी बैकफुट पर आ जाते हैं.
निर्देशक नेल्सन दिलीपकुमार इस बात की नब्ज बहुत अच्छे से पहचानते हैं कि थलाइवा के नाम पर ताली कैसे बजवानी है. पिछली बार जब ‘जेलर’ आई थी, तो उसने बॉक्स ऑफिस का पूरा नक्शा हिलाकर रख दिया था. अब जब ‘जेलर 2’ हाजिर है, तो कोई भी सिनेमा हॉल में किसी नोबेल प्राइज वाली स्क्रिप्ट की उम्मीद लेकर नहीं जा रहा. जनता सिर्फ मुथुवेल पांडियन का वही पुराना रौब और गोलियों की बरसात देखने टिकट कटा रही है. तो चलिए देखते हैं कि नेल्सन का ये नया मसाला परदे पर कितना तीखा उतरा है.
कहानी
कहानी का सिरा वहीं से जुड़ता है जहां पिछली बार खूनी खेल थमा था. वर्मन को ठिकाने लगाए अभी तीन महीने ही बीते हैं. मुथुवेल पांडियन (रजनीकांत) ने अपने परिवार की सलामती के लिए अपने ही बागी बेटे की बलि चढ़ा दी थी, लेकिन ये खौफनाक राज उसने अपने घर की चौखट के बाहर ही दफन रखा है. अब वो एक सुपरमार्केट में सुपरवाइजर बनकर आम इंसानों जैसी शांति भरी जिंदगी जीने की जुगत में लगा है.
लेकिन अपराध की दुनिया का उसूल है कि वो अपने पुराने गड़े मुर्दे कभी शांति से सोने नहीं देती. वर्मन के खात्मे के बाद मूर्तियों की तस्करी करने वाले बड़े सिंडिकेट का सरगना दिलीप (सूरज वेंजरामूडू) उस चेहरे की तलाश में निकल पड़ता है जिसने उनके धंधे पर डाका डाला था. जैसे ही मुथु की पुरानी पहचान का पर्दाफाश होता है, उसके परिवार की जान पर फिर बन आती है. इसके बाद मुथु अपने पुराने और कुछ नए सूरमाओं को आवाज लगाता है और आगे क्या होता है ये जानने के लिए आपको थियेटर में जाकर जेलर 2 देखनी होगी.
कैसी है फिल्म?
नेल्सन दिलीपकुमार की सबसे बड़ी चालाकी यह है कि वो अपनी सीमाओं को बखूबी जानते हैं. उन्हें मालूम है कि कहानी में कुछ खास नया नहीं है, इसलिए उन्होंने सारा दांव रजनीकांत के ‘ऑरा’ और उनकी कॉमिक टाइमिंग पर खेल दिया. फिल्म पूरे तीन घंटे सिर्फ और सिर्फ रजनीकांत की जय-जयकार करती है, लेकिन कमाल की बात यह है कि नेल्सन का स्क्रीनप्ले आपको घड़ी देखने पर मजबूर नहीं करता. फिल्म में जहां-जहां गोलियां चलती हैं, वहां माहौल भारी होने के बजाय मजेदार हो जाता है.
नेल्सन की फिल्मों की पहचान रही है उनकी ‘डेडपैन कॉमेडी’ यानी परदे पर चाहे जितनी लाशें गिर रही हों, चेहरे पर बिना कोई भाव लाए लतीफे फेंकना. योगी बाबू और नमो नारायणन जब मुथु के साथ मिलकर नौटंकी करते हैं, तो गंभीर से गंभीर सीन में भी दर्शक खुलकर हंसते हैं. हालांकि, बीच-बीच में जब कहानी जबरन इमोशनल होने की कोशिश करती है, तो रफ्तार थोड़ी डगमगाती है, मगर अगले ही पल जब थलाइवा की एंट्री होती है तो सब कुछ फिर से पटरी पर आ जाता है.
यहां देखें जेलर 2 का ट्रेलर-
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निर्देशन और राइटिंग
नेल्सन ने डायरेक्शन में वही सुरक्षित रास्ता चुना है जो उन्होंने पहली फिल्म में आजमाया था. उन्होंने पहिया दोबारा ईजाद करने की जहमत नहीं उठाई. राइटिंग के स्तर पर अगर आप गौर से देखें तो कहानी पहली फिल्म से बमुश्किल एक इंच आगे खिसकती है, बाकी सब कुछ सिर्फ स्टारडम का चकाचौंध भरा शोकेस है.
फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी है इसके कुछ किरदारों का बेहद अजीब कैरेक्टरायजेशन विद्या बालन जैसी सुलझी हुई अदाकारा (कांथा कल्पक के किरदार में) को फिल्म में जिस तरह मुथु के आगे लहालोट होते और उनके ‘मर्दानगी’ के कसीदे पढ़ते दिखाया गया है, वो थोड़ा असहज लगता है. इसी तरह मुथु की बहादुरी चमकाने के लिए एक गर्भवती महिला वाले सीन को जिस मेलोड्रामाई अंदाज में घसीटा गया, वो आज के दौर के सिनेमा में काफी आउटडेटेड लगता है. ऊपर से दो जबरन ठूंसे गए स्पेशल डांस नंबर्स सिर्फ फिल्म की लंबाई बढ़ाने का काम करते हैं, जिनकी यहां कोई जरूरत नहीं थी.
एक्टिंग
परफॉर्मेंस की बात करें तो पूरी महफिल अकेले रजनीकांत के नाम है. 75 साल की उम्र में जब वो एक दादा के रोल में होकर भी अपनी आंखों के इशारे से गुंडों की रीढ़ में कंपकंपी पैदा करते हैं, तो समझ आता है कि उन्हें ‘सुपरस्टार’ क्यों कहा जाता है. उनकी मौजूदगी में एक ऐसा सम्मोहन है जो हर कमजोर सीन को भी झेलने लायक बना देता है. बाकी कलाकारों की बात करें तो एसजे सूर्या, मिथुन चक्रवर्ती और राम्या कृष्णन जैसे दिग्गजों की फौज खड़ी की गई है, मगर वो सब सिर्फ मुथुवेल पांडियन के रुतबे को चार चांद लगाने वाले मोहरे बनकर रह जाते हैं.
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एसजे सूर्या अपने खास सनकी अंदाज में कुछ पलों के लिए ध्यान खींचते हैं, लेकिन उनके हिस्से ज्यादा कुछ आया नहीं. पिछली बार जैसे मोहनलाल, शिवा राजकुमार और जैकी श्रॉफ के कैमियो ने थिएटर की छत फाड़ दी थी, इस बार के सरप्राइज कैमियो असरदार तो हैं, लेकिन उस जादू को पूरी तरह दोहरा नहीं पाते.
देखें या नहीं?
‘जेलर 2’ उस शादी के ग्रैंड रिसेप्शन जैसी है जहां मेन्यू भले ही कल वाला हो, मगर हलवाई ने तड़का इतना जानदार लगाया है कि थाली खाली करके ही उठने का मन करता है. अगर आप सिनेमाई बारीकियां या कोई गहरी सामाजिक सीख तलाश रहे हैं, तो यह दरवाजा आपके लिए नहीं है. लेकिन अगर आप एक थके हुए हफ्ते के बाद सिर्फ पॉपकॉर्न चबाते हुए परदे पर रजनीकांत का वही अमर जलवा देखना चाहते हैं, तो यह फिल्म आपको बिल्कुल निराश नहीं करेगी. थलाइवा का यह तूफान हर उस दर्शक के लिए पैसा वसूल है जो सिनेमा को सिर्फ और सिर्फ सीटी बजाने का बहाना मानता है.




