Mirzapur Budget Reality: कालीन भैया के 70mm भौकाल पर 250 करोड़ का दावा, जानिए वायरल बजट का सच या है सिर्फ ट्रेंडिंग गिमिक?

Mirzapur Budget Reality: कालीन भैया के 70mm भौकाल पर 250 करोड़ का दावा, जानिए वायरल बजट का सच या है सिर्फ ट्रेंडिंग गिमिक?

'मिर्ज़ापुर: द मूवी' को लेकर सोशल मीडिया पर 250 करोड़ के भारी-भरकम बजट का दावा हो रहा है. लेकिन क्या सच में पर्दे पर इतना पैसा लगा है या ये सिर्फ इंटरनेट का अनऑफिशियल नंबर गेम है? जानिए इनसाइड स्टोर

ओटीटी पर तीन सीजन्स तक गर्दा उड़ाने के बाद ‘मिर्जापुर’ का भौकाल अब 70mm के बड़े पर्दे पर आ चुका है. थिएटर्स में सीटियां बज रही हैं, कट्टे चल रहे हैं और पूर्वांचल की गद्दी के लिए खून-खराबा जारी है. लेकिन फिल्म की रिलीज के साथ ही सिनेमा के गलियारों और इंटरनेट पर एक आंकड़े ने सबको चौंका दिया है. दावा किया जा रहा है कि ‘मिर्ज़ापुर: द मूवी’ का बजट करीब 250 करोड़ रुपये है! अब जैसे ही एक आम दर्शक 250-300 रुपये का टिकट कटाकर थिएटर की कुर्सी पर बैठता है, तो पहले ही आधे घंटे में उसके जेहन में ये सवाल जरूर आता है कि अगर इस फिल्म पर 250 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं, तो वो स्क्रीन पर दिख कहां रहे हैं?

न तो इसमें ‘बाहुबली’ या ‘आरआरआर’ जैसा कोई भारी-भरकम वीएफएक्स (VFX) का मायाजाल है, न ही जेम्स बॉन्ड जैसी कोई विदेशी लोकेशंस और न ही सैकड़ों घोड़ों-हाथियों का कोई पीरियड सेट। वही पूर्वांचल की मिट्टी, वही देसी गाड़ियां, वही गलियां और वही गोलियां… तो फिर ये 250 करोड़ का आंकड़ा आखिर आया कहां से? क्या सच में मेकर्स ने पानी की तरह पैसा बहाया है या फिर यह सिर्फ इंटरनेट के ट्रेंडिंग दौर का एक और हवा-हवाई शिगूफा है?

अक्सर लोग ऐसे मामलों में सीधे फिल्म के पीआर (PR) या प्रोडक्शन हाउस पर उंगली उठा देते हैं कि वो खुद अपनी फिल्म को बड़ा दिखाने के लिए ये आंकड़े प्लांट करते हैं. लेकिन हकीकत इससे बिल्कुल अलग है. आज के सोशल मीडिया युग में अनऑफिशियल मूवी पोर्टल्स, अनवेरिफाइड फिल्मी हैंडल्स और अंधाधुंध चलने वाले फैन क्लब्स इन आंकड़ों के सबसे बड़े जनक हैं.

ट्रेंडिंग में खो रही है सच्चाई

होता यह है कि किसी भी बड़ी फिल्म के नाम के आगे अगर एक चौंकाने वाला ‘नंबर’ चिपका दिया जाए, जैसे ‘250 करोड़ का बजट’ तो उस पोस्ट पर एंगेजमेंट, शेयर्स और क्लिक्स की बाढ़ आ जाती है. बिना किसी आधिकारिक सबूत या बैलेंस शीट के ये आंकड़ा एक्स (ट्विटर) और इंस्टाग्राम पर ट्रेंड करने लगता है और देखते ही देखते जनता उसे सच मान बैठती है.

‘मिर्ज़ापुर’ के जरिए समझिए एक्टर्स की फीस और प्रॉफिट का गणित

जब किसी प्रोजेक्ट का बजट 200 या 250 करोड़ बताया जाता है, तो लोग मान लेते हैं कि पंकज त्रिपाठी, अली फजल या बाकी कास्ट ने करोड़ों की मोटी फीस वसूली होगी. टीवी और फिल्मों के बड़े स्टार्स कई बार इस भ्रम को तोड़ चुके हैं. हाल ही में टीवी पर क्राइम शो को लेकर यह खबर सनसनी बन गई कि अजय देवगन ने 15 एपिसोड्स के लिए 90 करोड़ रुपये ले लिए. वहीं सलमान खान तो खुद कई बार ऑन-कैमरा कह चुके हैं कि ‘बिग बॉस’ के लिए जितनी फीस मीडिया में बताई जाती है, असल में उसका आधा भी उन्हें नहीं मिलता.

जब अहमद खान और रितेश देशमुख ने उतारी थी बजट्स की हवा

‘मिर्जापुर’ अकेला ऐसा प्रोजेक्ट नहीं है जिसके सिर पर इतना बड़ा आंकड़ा मढ़ दिया गया हो. जब ‘वेलकम टू द जंगल’ के 200 से 250 करोड़ में बनने की अफवाहें उड़ीं, तो खुद डायरेक्टर अहमद खान ने सामने आकर इस गुब्बारे की हवा निकाल दी थी. अहमद खान ने दो-टूक कहा था, “लोग सोचते हैं कि मैं बहुत महंगा डायरेक्टर हूं, लेकिन मैं पूरी तरह प्रोड्यूसर्स का डायरेक्टर हूं. ‘वेलकम टू द जंगल’ को मैंने 115 से 125 करोड़ रुपये के भीतर समेटा है. 200 या 250 करोड़ में फिल्में नहीं बनतीं, अगर उतना पैसा लग रहा है तो वो सिर्फ बर्बादी है.”

यही बात तब भी देखने को मिली थी जब रितेश देशमुख की छत्रपति शिवाजी महाराज पर आधारित फिल्म ‘राजा शिवाजी’ को लेकर दावा किया गया कि यह 100 करोड़ की फिल्म है. रितेश ने बहुत खूबसूरती से जवाब देते हुए कहा था कि बजट की चर्चा से सिनेमा का जादू खत्म हो जाता है। रितेश ने कहा था कि बचपन में जब लोग अमिताभ बच्चन की ‘शोले’ देखने जाते थे, तो कभी किसी ने बजट नहीं पूछा। बजट का सच सिर्फ प्रोड्यूसर को पता होता है और दर्शक के लिए सिर्फ वो टिकट का दाम ही असली बजट होना चाहिए.

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अमेजन एमजीएम स्टूडियोज

‘मिर्ज़ापुर: द मूवी’ के पीछे खड़ा है अमेजन एमजीएम स्टूडियोज और फरहान अख्तर-रितेश सिधवानी की एक्सेल एंटरटेनमेंट. हॉलीवुड में दशकों तक थिएट्रिकल और बॉक्स ऑफिस का मास्टर रहा अमेजन एमजीएम जब भारतीय सिनेमा में कदम रखता है, तो वो हवा में तीर नहीं चलाता. चाहे ‘मिर्जापुर’ हो या कुणाल खेमू-प्रीति जिंटा की आने वाली स्पाई-कॉमेडी ‘वाइब’ (Vibe)… कॉरपोरेट स्टूडियोज का बिजनेस मॉडल बहुत टाइट और कंट्रोल्ड होता है. वे फिल्म के विजुअल स्केल के हिसाब से ही बजट तय करते हैं और रिलीज से पहले ही ओटीटी राइट्स, सैटेलाइट और म्यूजिक डील्स के जरिए अपनी लागत को 80% तक सेफ कर लेते हैं. ऐसे में 250 करोड़ जैसी अंधी रकम किसी देसी गैंगस्टर ड्रामा में झोंक देना किसी भी कॉर्पोरेट स्टूडियो की स्ट्रैटेजी में फिट नहीं बैठता.

स्क्रीन का भौकाल बनाम इंटरनेट का नंबर गेम

‘मिर्ज़ापुर: द मूवी’ का असली वजन उसकी 250 करोड़ी अफवाहों में नहीं, बल्कि कालीन भैया के खौफ और गुड्डू पंडित के बदले में है, सोशल मीडिया पर बजने वाले इन आंकड़ों के ढोल अक्सर अंदर से पूरी तरह खोखले होते हैं. जब तक मेकर्स खुद कोई आंकड़ा आधिकारिक रूप से जारी न करें, तब तक 250 करोड़ के इस ड्रामे को सिर्फ एक ‘वायरल डिजिटल गिमिक’ से ज्यादा कुछ नहीं समझना चाहिए!

सोनाली नाईक
सोनाली नाईक

सोनाली करीब 15 सालों से पत्रकारिता की दुनिया में सक्रिय हैं. जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी करने के बाद प्रहार न्यूज पेपर से उन्होंने अपने करियर की शुरुआत की थी. इस न्यूज पेपर में बतौर रिपोर्टर काम करते हुए सोनाली ने एंटरटेनमेंट बीट के साथ-साथ सीसीडी (कॉलेज कैंपस और ड्रीम्स) जैसे नए पेज पर काम किया. उन्होंने वहां 'फैशनेरिया' नाम का कॉलम भी लिखा. इस दौरान एलएलबी की पढ़ाई भी पूरी की, लेकिन पत्रकारिता के जुनून की वजह से इसी क्षेत्र में आगे बढ़ने के इरादे से 2017 में टीवी9 से सीनियर कोरेस्पोंडेंट के तौर पर अपनी नई पारी शुरू की. टीवी9 गुजराती चैनल में 3 साल तक एंटरटेनमेंट शो की जिम्मेदारी संभालने के बाद सोनाली 2020 में टीवी9 हिंदी डिजिटल की एंटरटेनमेंट टीम में शामिल हुईं. सोनाली ने टीवी9 के इस सफर में कई ब्रेकिंग, एक्सक्लूसिव न्यूज और ऑन ग्राउंड कवरेज पर काम किया है. हिंदी के साथ-साथ गुजराती, मराठी, इंग्लिश भाषा की जानकारी होने के कारण डिजिटल के साथ-साथ तीनों चैनल के लिए भी उनका योगदान रहा है. रियलिटी शोज और ग्लोबल कंटेंट देखना सोनाली को पसंद है. नई भाषाएं सीखना पसंद है. संस्कृत भाषा के प्रति खास प्यार है. नुक्कड़ नाटक के लिए स्क्रिप्ट लिखना पसंद है. सोनाली के लिखे हुए स्ट्रीट प्लेज 'पानी', 'मेड इन चाइना' की रीडिंग 'आल इंडिया रेडियो' पर सोशल अवेयरनेस के तौर पर की जा चुकी है.

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