Daayra Review: मेघना गुलजार ने फिर पेश की एक झकझोर देने वाली दास्तान, जानिए करीना-पृथ्वीराज की ये जुगलबंदी क्या रंग लाई?
फिल्म दायरा बलात्कार और एनकाउंटर जैसे खौफनाक सच के बीच कानून बनाम इंसाफ की जंग दिखाती है. अगर आप इस वीकेंड फिल्म देखने की प्लानिंग कर रहे हैं तो टिकट बुक करने से पहले पढ़ें रिव्यू.
Daayra Film Review: ‘तलवार’ और ‘राजी’ जैसी फिल्में बनाने वाली मेघना गुलजार का नाम जब किसी पर्दे पर आता है, तो दर्शक यह मानकर चलते हैं कि कुछ ऐसा देखने को मिलेगा जो सीधे दिल में चुभेगा. इस बार उनके साथ हैं करीना कपूर खान और पृथ्वीराज सुकुमारन. मुद्दा भी वही है जो अक्सर हमारे-आपके घरों में TV देखते हुए बहस की वजह बन जाता है, जब किसी बेटी के साथ कोई दरिंदगी हो, तो क्या पुलिस को आरोपियों को फौरन गोली मार देनी चाहिए, या फिर अदालत के चक्कर काटने चाहिए? दायरा इसी बारे में है. लेकिन टिकट कटाने से पहले यह बात दिमाग में बैठा लीजिए कि अगर आप ‘सिंघम’ की तरह गाड़ियां उड़ते और हीरो को दहाड़ते हुए गलत के खिलाफ लड़ते हुए देखना चाहते हैं, तो यह फिल्म आपके लिए बिल्कुल नहीं है.
फिल्म शुरू होते ही ये साफ कर देती है कि यहां कोई फिल्मी तमाशा नहीं होने वाला. ये आम जनता के गुस्से और कानून की किताबों के बीच फंसी उस मजबूरी की बात करती है, जहां सही कौन है और गलत कौन, ये तय करना किसी के लिए भी आसान नहीं होता. तो क्या करीना और पृथ्वीराज की ये फिल्म टिकट के पूरे पैसे वसूल कराती है या फिर थियेटर से निकलते वक्त अधूरापन छोड़ जाती है? चलिए इस पर विस्तार से बात करते हैं.
कैसी है फिल्म की कहानी?
कहानी की शुरुआत एक ऐसे हादसे से होती है जो किसी के भी आंखों में आंसू लेकर आए. 24 साल की एक लड़की रात को गायब होती है और फिर उसकी जली हुई लाश मिलती है. पूरे शहर में गुस्सा फूट पड़ता है, लोग सड़कों पर उतर आते हैं और पुलिस पर दबाव बन जाता है कि किसी भी तरह नतीजा चाहिए. इस केस की कमान संभालते हैं डीसीपी रमन कुमार (पृथ्वीराज सुकुमारन). रमन और उनकी टीम कुछ ही दिनों में चार आरोपियों को पकड़ती है और फिर अचानक एक रात खबर आती है कि पुलिस ने चारों को एनकाउंटर में मार गिराया. जनता खुश हो जाती है, रमन के नाम के जयकारे लगते हैं और उन्हें ‘असली हीरो’ मान लिया जाता है.
लेकिन असली पेंच यहीं से फंसता है। एनकाउंटर की इस कहानी पर जब कुछ सवाल उठते हैं, तो मामले की दोबारा जांच करने के लिए एसआईटी बनाई जाती है, जिसकी हेड बनती हैं डीसीपी अजोनी कोहली (करीना कपूर खान). अजोनी कानून के दायरे में रहकर काम करने वाली अफसर हैं. जब वो पुरानी फाइलों को दोबारा खोलती हैं, तो उन्हें समझ आता है कि जो बात जितनी सीधी दिखाई जा रही है, उतनी है नहीं. एक तरफ रमन हैं जिनका मानना है कि जब सिस्टम सड़ चुका हो तो मौके पर इंसाफ ही जनता का भरोसा बचाता है, वहीं दूसरी तरफ अजोनी हैं जो मानती हैं कि अगर पुलिस ही जज बन जाएगी तो कानून का क्या होगा? अब इस लड़ाई का क्या अंजाम होता है, इसके लिए आपको थियेटर का रुख करना पड़ेगा.
कैसी है फिल्म?
‘दायरा’ की सबसे अच्छी बात यह है कि ये किसी भी किरदार पर जबरदस्ती ‘अच्छा’ या ‘बुरा’ होने का ठप्पा नहीं लगाती. ये दर्शकों को किसी एक के पक्ष में खड़ा करने के बजाय सोचने पर मजबूर करती है. जब आप उस बेबस परिवार का दर्द और पुलिस की शुरुआत की ढिलाई देखते हैं, तो खून खौलता है. लेकिन जब पुलिस खुद कानून को हाथ में लेती है, तो ये डर भी लगता है कि अगर कल को किसी बेगुनाह के साथ ऐसा हो गया तो क्या होगा?
फिल्म का मिजाज पूरी तरह से सीरियस वाला है. यहां न तो बेवजह का शोर-शराबा है और न ही कानों के पर्दे फाड़ने वाला बैकग्राउंड म्यूजिक. पूरी फिल्म में एक धीमी सी बेचैनी चलती रहती है. रमन और अजोनी के बीच जब-जब आमना-सामना होता है, तो बिना ऊंची आवाज के भी दोनों की आंखों में वो तनातनी साफ नजर आती है. लेकिन हां, यह कोई पॉपकॉर्न चबाते हुए टाइमपास करने वाली फिल्म नहीं है. ये मन में एक भारीपन और गुस्सा छोड़ती है, जो शायद हर दर्शक को रास न आए.
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कैसा है डायरेक्शन और कहां रह गई कमी?
मेघना गुलजार ने माहौल तो बहुत सच्चा बनाया है, लेकिन इस बार उनकी कलम थोड़ी डगमगाती हुई दिखती है. फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी है इसकी रफ्तार. इंटरवल से पहले का काफी वक्त सिर्फ सीसीटीवी फुटेज देखने, थाने में कागजी पूछताछ करने और पुरानी बातें दोहराने में निकल जाता है. एक आम दर्शक के नाते आपको लगता है कि कहानी आगे क्यों नहीं बढ़ रही?
दूसरी बात, फिल्म जिस बड़े मुद्दे को उठाती है, क्लाइमैक्स तक आते-आते खुद ही उसका कोई साफ जवाब देने से बचती नजर आती है. ऐसा लगता है कि मेकर्स तय ही नहीं कर पाए कि उन्हें एनकाउंटर का समर्थन करना है या कानून का. अजोनी जो इतने सवाल खड़े कर रही थीं, अंत में उनके सारे तर्कों को थोड़ा कमजोर कर दिया जाता है. इस वजह से जब फिल्म खत्म होती है, तो दिल में एक अजीब सा अधूरापन और खालीपन रह जाता है कि आखिर यह सब हुआ किसलिए?
एक्टिंग
एक्टिंग की बात करें तो दोनों ही मुख्य कलाकारों ने कमाल का काम किया है. पृथ्वीराज सुकुमारन पुलिस की वर्दी में बेहद असरदार लगे हैं. उन्होंने अपने किरदार को कोई फिल्मी गुंडा या लाउड कॉप नहीं बनाया. वे पूरे समय इतने शांत और अपने फैसले पर अडिग दिखते हैं कि उनका वही सन्नाटा सामने वाले को डरा देता है. वहीं करीना कपूर खान ने अजोनी के रोल में बहुत कंट्रोल वाली एक्टिंग की है. बिना कोई भारी-भरकम डायलॉग बोले, उन्होंने एक जिम्मेदार अफसर का दर्द और उलझन अपने एक्सप्रेशन से दिखाई है. हालांकि कुछ जगहों पर उनका एक जैसा चेहरा और हल्की सी मुस्कान थोड़ी अजीब लगती है, लेकिन कुल मिलाकर उनका काम बहुत सधा हुआ है. बाकी सपोर्टिंग कास्ट जैसे कंवलजीत सिंह, अचिंत कौर, सीमा आजमी, अनुजा साठे और जितेंद्र जोशी ने भी अपने किरदारों को ईमानदारी से निभाया है, हालांकि उनके हिस्से में बहुत बड़े सीन नहीं आए हैं.
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क्यों देखें और क्यों न देखें?
अगर आप थियेटर में तेज रफ्तार एक्शन, मसालेदार ट्विस्ट या कोई ऐसा ड्रामा ढूंढ रहे हैं जो आपको सीट से उछलने पर मजबूर कर दे, तो ‘दायरा’ आपके सब्र का इम्तिहान ले सकती है. इसका सुस्त स्क्रीनप्ले और बिना किसी साफ नतीजे वाला अंत आपको थोड़ा बोर भी कर सकता है. लेकिन अगर आप एक सीरियस, जरूरी और कड़वे मुद्दे पर बनी सच्ची फिल्म देखना चाहते हैं, तो करीना और पृथ्वीराज की इस जुगलबंदी को एक बार देखा जा सकता है. कुल मिलाकर ‘दायरा’ एक जरूरी मुद्दे पर बात करती है और सिस्टम की लाचारी को बेपर्दा करती है, लेकिन अपने ही उठाए सवालों के जवाब देने में थोड़ी लड़खड़ा जाती है. अगर फिल्म की रफ्तार थोड़ी तेज होती और क्लाइमैक्स ज्यादा क्रिस्प होता, तो ये बात कुछ और होती. फिर भी, शानदार एक्टिंग के दम पर यह एक बार देखने लायक फिल्म तो बनती है.




