Manoj Kumar Birth Anniversary: मनोज कुमार और धर्मेंद्र की अनोखी दास्तान, दिल छू लेगी स्ट्रगल की कहानियां

Manoj Kumar Birth Anniversary: मनोज कुमार और धर्मेंद्र की अनोखी दास्तान, दिल छू लेगी स्ट्रगल की कहानियां

Manoj Kumar and Dharmendra's friendship: 4 अप्रैल, 2025 को जब मनोज कुमार का निधन हुआ तो धर्मेंद्र बिलख रहे थे. पार्थिव शरीर का अंतिम दर्शन करने आए तो जुबान लड़खड़ा रही थी- 'मेरा दोस्त मुझे छोड़ कर चला गया...' चौंकाने वाली बात ये कि महज सात महीने बाद धर्मेंद्र भी दुनिया को अलविदा कह गए. जानते हैं दो जिगरी दोस्तों की दिल छूने वाली दास्तान.

भारत कुमार के नाम से भी मशहूर अभिनेता-निर्माता-निर्देशक मनोज कुमार को दादा साहेब फाल्के सम्मान मिला तो धर्मेंद्र भी गदगद हुए. धर्मेंद्र का उत्साहित होना लाजिमी था. तब धर्मेंद्र ने कहा था कि मनोज कुमार को दादा साहेब फाल्के सम्मान मिलना उनके लिए भी उतना ही महत्वपूर्ण है. क्योंकि दोनों एक-दूसरे के फिल्मी करियर की यात्रा में दुख-सुख के साक्षी रहे हैं. दोनों दिग्गज कलाकारों के स्ट्रगल के दिनों की बहुत ही दिलचस्प और दिल छू लेने वाली कहानियां हैं.

बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि संघर्ष के दिनों में धर्मेंद्र और मनोज कुमार एक ही कमरे में रहते थे. यहां तक कि दोनों एक दूसरे के कपड़े भी पहन लेते थे. साठ के दशक की कुछ फिल्मों में दोनों अलग-अलग एक समान शर्ट में देखे गए हैं. दिलचस्प बात ये है कि तब दोनों की कद काठी करीब-करीब एक जैसी हुआ करती थी, लिहाजा खासतौर पर शर्ट दोनों एक-दूसरे की पहन लिया करते थे.

पंजाबियत दोनों के दिलों को करीब ले आई

मनोज कुमार भले ही दिल्ली से मुंबई गए थे लेकिन उनका वास्ता भी उसी तरह से पंजाब की धरती से रहा है, जैसा कि धर्मेंद्र का. धर्मेंद्र भी लुधियाना से मुंबई गए थे. पंजाबियत दोनों के दिलों को एक-दूसरे के करीब ले आई. हालांकि दोनों की उम्र में करीब दस साल का फर्क था. मनोज कुमार का जन्म 24 जुलाई सन् 1925 को हुआ था, जबकि धर्मेंद्र का जन्म 8 दिसंबर सन् 1935 को. लेकिन दोनों के फिल्मी करियर को देखें तो उसमें अंतर कम है. मनोज कुमार की पहली फिल्म फैशन सन् 1957 में आई जबकि धर्मेंद्र की पहली फिल्म दिल भी तेरा हम भी तेरे सन् 1960 में.

फिल्म इंडस्ट्री का उसूल जुदा है. बाहर से गए कलाकारों को पहली फिल्म मिल जाना ही काफी नहीं होता. इसके बाद भी लगातार फिल्में मिलते रहने और उसकी कामयाबी से ही आगे की राह प्रशस्त होती है. इस मामले में दोनों कलाकारों को कई और दिग्गजों की तरह ही कठिन संघर्ष का सामना करना पड़ा. लेकिन दोनों की शख्सियत बहुत ही मददगार कलाकार वाली रही है. जैसै कि धर्मेंद्र अपने समय में नए कलाकारों की मदद किया करते थे, उसी तरह से मनोज कुमार भी. मनोज कुमार ने धर्मेंद्र ही नहीं बल्कि विनोद खन्ना और अमिताभ बच्चन की भी बहुत मदद की. निराश धर्मेंद्र को पंजाब वापस जाने से रोका था.

मनोज कुमार ने धर्मेंद्र को अपने साथ रखा

धर्मेंद्र के जीवन में एक समय ऐसा भी आया जब उनके पास रहने को घर नहीं था और ना कोई काम. ऐसे समय में मनोज कुमार ने उन्हें अपने साथ रखा और उनको कपड़े खरीद कर दिए. पिछले दिनों उन दोनों कलाकारों के एक और जिगरी दोस्त जितेंद्र ने उनकी दोस्ती और संघर्ष की दास्तान का खुलासा किया था. जितेंद्र ने बताया था कि धर्मेंद्र मनोज कुमार के सबसे करीबी दोस्त थे. मनोज कुमार ने धर्मेंद्र की प्रतिभा को पहले भी भांप लिया था और उनकी मदद करने की ठानी थी.

जितेंद्र ने तो यहां तक बताया कि संघर्ष के दिनों में दोनों जब स्क्रीन टेस्ट के लिए जाते थे तो एक-दूसरे के कपड़े पहन लिया करते थे. दोनों के कपड़ों की साइज भी एक समान हुआ करती थी. यही कहानी एक बार सनी देओल ने भी सुनाई थी. सनी देओल ने बताया था कि मनोज कुमार शर्ट खरीद कर लाते और धर्मेंद्र से कहते- ये तेरे लिए है.

दो रोटी कमाएंगे, बांट कर खाएंगे

धर्मेंद्र ने मनोज कुमार की दरियादिली के बारे में एक अनोखा किस्सा शेयर किया था. धर्मेंद्र ने बताया था कि वो लगातार स्क्रीन टेस्ट में रिजेक्ट होते गए. डायरेक्टर्स प्रोड्यूसर्स की लगातार ना सुन सुन कर वो इतने निराश हो गए कि लुधियाना पंजाब लौटने का फैसला कर लिया. करीब करीब बोरिया बिस्तर भी समेट लिया. लेकिन ऐन वक्त पर मनोज कुमार ने हौसला अफजाई की. उन्होंने धर्मेंद्र को यह कहते हुए रोका कि अगर दो रोटी कमाएंगे तो एक-एक रोटी बांट कर खा लेंगे. मनोज कुमार की यह बात धर्मेंद्र के दिल को छू गई और उन्होंने पंजाब लौटने का फैसला टाल दिया. अगर धर्मेंद्र तभी पंजाब लौट जाते तो इंडस्ट्री को ही मैन नहीं मिलता.

जिगरी दोस्ती पर्दे पर निभाने का मौका नहीं मिला

लेकिन गहरी दोस्ती के बावजूद दोनों कलाकारों को किसी फिल्म में साथ-साथ स्क्रीन शेयर करने का मौका लंबे समय तक नहीं मिला. हालांकि कई बार दोनों ने एक ही फिल्म में साथ-साथ काम जरूर किया, मसलन राज कपूर की मेरा नाम जोकर. यह तथ्य अनोखा है कि दोनों पर्दे के पीछे साथ-साथ रहे लेकिन फिल्मी पर्दे पर साथ-साथ नहीं दिखे. इसका छोटा-सा नजारा दिखा सन् 1995 की मैदाने जंग के एक गाने में. अनोखी बात ये कि बतौर अभिनेता मैदाने जंग मनोज कुमार की आखिरी फिल्म थी और बतौर निर्देशक 1999 में आई जय हिंद.

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संजीव श्रीवास्तव
संजीव श्रीवास्तव

संजीव श्रीवास्तव का पैतृक गांव-घर बिहार के सीतामढ़ी में है लेकिन पिछले करीब ढाई दशक से दिल्ली से लेकर मुंबई तक मीडिया की मुख्यधारा में सक्रिय हैं. ब्रेकिंग न्यूज़ से लेकर क्रिएटिव राइटिंग तक का हुनर रखते हैं, देश-विदेश की राजनीति, फिल्म, लिटरेचर, क्राइम जैसे विषयों पर बेबाकी से लिखते हैं. आसानी से समझ आने वाली और सोचने-विचारने वाली भाषा लिखना पसंद है. सिनेमा प्रिय विषय है- लिहाजा फिल्मों पर अब तक तीन किताबें, दो उपन्यास और कुछ पटकथा-संवाद भी लिख चुके हैं. कुछेक प्रिंट मीडिया में सब एडिटरी के बाद साल 2000 से टीवी न्यूज़ की दुनिया में प्रवेश. सबसे पहले जैन टीवी फिर सहारा समय में करीब 14 साल गुजारा, जहां प्राइम टाइम स्पेशल शोज/प्रोग्राम बनाने से लेकर मुंबई की एंटरटेंमेंट फील्ड में रिपोर्टिंग तक की. उसके बाद सूर्या समाचार, एबीपी न्यूज़ और न्यूज़ इंडिया के आउटपुट होते हुए अब डिजिटल मीडिया में TV9 से सम्बद्ध.

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