Reporting Live Review: ग्राउंड रिपोर्टिंग की असली तपिश या सिर्फ हवा-हवाई बातें? कैसा है परिणीति चोपड़ा का ये न्यूजरूम ड्रामा?
Reporting Live Review: पत्रकारिता के आदर्शों और कॉर्पोरेट दबाव के बीच फंसी रिपोर्टर की जमीनी जंग दिखाने वाली परिणीति की फिल्म लोकतंत्र के चौथे खंभे की कड़वी सच्चाई बयां कर पाती है या नहीं?
Reporting Live Review: हिंदी सिनेमा में जब भी पत्रकारों पर कैमरा घूमता है, तो दो ही ढर्रे देखने को मिलते हैं. पहला वो, जहां डायरेक्टर किसी रिटायर्ड पत्रकार से चाय की चुस्की पर आधा घंटा गपशप लड़ाकर खुद को मीडिया का सबसे बड़ा जानकार मान बैठता है. दूसरा वो, जहां चार अलग-अलग न्यूज़रूम की हवा खाकर इतनी भारी-भरकम और किताबी थ्योरी परोसी जाती है, मानो दर्शक पहली क्लास का बच्चा हो जिसे ‘क ख ग’ से मीडिया की एबीसीडी सिखाई जा रही हो. ‘स्पॉटलाइट’ या ‘स्कूप’ जैसी कहानियों ने जिस पत्रकारिता को पर्दे पर उतारा था, उसी तरह की फिल्म है ‘रिपोर्टिंग लाइव’.
परिणीति चोपड़ा हाथ में माइक थामकर ‘आज़ाद भारती’ चैनल की जांबाज रिपोर्टर संध्या यादव बनकर मैदान में कूदी हैं. इरादा तो यह ये कि लोकतंत्र के चौथे खंभे की चूलें हिला दी जाएं, मगर सवाल यह उठता है कि क्या ये फिल्म फील्ड रिपोर्टिंग के पसीने और न्यूज़रूम के तनाव को ईमानदारी से पेश कर पाती है, या फिर ये भी महज़ एक बोरिंग ड्रामा बनकर रह जाती है? आइए इस पर विस्तार से चर्चा करते हैं.
कहानी
ये कहानी है संध्या यादव (परिणीति चोपड़ा) और उनके भरोसेमंद कैमरामैन विनोद की. दोनों मुंबई के एक हिंदी न्यूज़ चैनल में काम करते हैं, जो दिखने में पॉश कॉर्पोरेट दफ्तर जैसा दिखता है. संध्या का सपना है प्राइम-टाइम स्लॉट हथियाना और साल का तगड़ा बोनस उठाना. शाम को दफ्तर से छूटकर वो अपने महंगे फ्लैट में अपने पालतू कुत्ते के साथ थकान मिटाती हैं.
कहानी में भूचाल तब आता है जब महाराष्ट्र के ग्रामीण इलाके में एक पुल भरभराकर गिर जाता है. संध्या और विनोद इस हादसे की तह तक जाने के लिए फील्ड पर निकलते हैं और उनके हाथ लगता है एक बहुत बड़ा सिंडिकेट अवैध रेत खनन का काला साम्राज्य. इस सिंडिकेट के तार सीधे शहर के बड़े बिल्डरों, उद्योगपतियों और कॉर्पोरेट दिग्गजों से जुड़े हैं. संध्या अपनी जान हथेली पर रखकर इस एक्सक्लूसिव खुलासे को चैनल पर ऑन-एयर करने की ज़िद ठान लेती है. इसके बाद शुरू होता है धमकियों, गवाहों के कत्ल और चैनल मैनेजमेंट के भीतर से रिपोर्ट दबाने का वही पुराना सत्ताई खेल. क्या एक मामूली रिपोर्टर इस विशालकाय कॉर्पोरेट तंत्र को झुका पाती है, ये जानने के लिए आपको सीरीज की तरह खींचने वाली फिल्म देखनी होगी.

सीरीज ‘रिपोर्टिंग लाइव’
कैसी है फिल्म?
किसी इनवेस्टिगेटिव रिपोर्टर की दौड़-भाग देखना हमेशा से रोमांचक रहा है, लेकिन यहां सबसे बड़ी अड़चन है इसका बेहद सतही ट्रीटमेंट. शुरुआत तो एक खूनी मर्डर से होती है, मगर वो सीन इतना ज़्यादा बनावटी और फिल्मी लगता है मानो किसी रोमांटिक गाने की शूटिंग में अचानक एक्शन डायरेक्टर आ घुसा हो. फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि ये अपनी मुख्य पत्रकार को दुनियादारी से पूरी तरह अनजान दिखाती है.
एक टीवी रिपोर्टर में जो बेचैनी, आक्रामकता और तीखापन होना चाहिए, संध्या के किरदार में वो पूरी तरह से गायब है. जब गांव के एक बुजुर्ग (अमोल पालेकर) उन्हें रेत माफिया की सच्चाई समझाते हैं, तो संध्या ऐसे सुनती हैं जैसे उन्होंने ज़िंदगी में पहली बार कोई खबर सुनी हो. जब वो अवैध खदान पर चोरी-छिपे शूटिंग करने जाती हैं, तो मजदूरों से कह देती हैं कि हम तो ‘डॉक्यूमेंट्री’ बना रहे हैं! ये कारण इतना बचकाना है कि देखने वाले का सिर चकरा जाए, क्या माफिया सचमुच डॉक्यूमेंट्री वालों को अपनी काली करतूतें आराम से शूट करने देगा? ऐसे कई सीन्स फिल्म के सीरियस विषय की पूरी हवा निकाल देते हैं.

परिणीति की सीरीज
निर्देशन और राइटिंग
लेखन के स्तर पर फिल्म में डिटेलिंग की भारी किल्लत साफ नज़र आती है. गांव दिखाते ही कैमरे पर अजीब सा पीला-भूरा ‘रूरल फिल्टर’ चढ़ा दिया जाता है, और विलेन को खूंखार दिखाने के लिए वही पुराना ट्रांजिस्टर वाला फॉर्मूला इस्तेमाल होता है. न्यूज़रूम के अंदर की कार्यप्रणाली को भी बहुत हल्के में लिया गया है. बिना किसी तैयारी के स्टूडियो से अचानक कोई बड़ा टेप लाइव ऑन-एयर कर देना आज के आधुनिक डिजिटल दौर में किसी भी पीसीआर (प्रोडक्शन कंट्रोल रूम) के लिए मजाक जैसा लगता है. जब संध्या का पूर्व एडिटर (शाश्वत चटर्जी) से सिनेमा हॉल के अंधेरे में मिलने वाला सीन आता है, तो दोनों इतनी बेफिक्री से बतियाते हैं कि कोई भी उन पर शक कर ले. डायलॉग कई जगहों पर बहुत किताबी हो जाते हैं. कई जगह ये फिल्म देखते हुए गंभीर इन्वेस्टिगेटिव थ्रिलर के बजाय अस्सी के दशक की मेलोड्रामा फिल्मों की याद दिलाते हैं शायद यही वजह है कि इसे एक ही समय में देखने का मन भी नहीं होता.
एक्टिंग
इस पूरी भीड़ में सबसे अच्छा काम आदिल हुसैन और शेखर सुमन के हिस्से आया है. आदिल हुसैन ने एक ऐसे एग्जीक्यूटिव एडिटर का किरदार निभाया है जो अपने चैनल को कॉर्पोरेट मालिक (शेखर सुमन) के हाथों बेच चुका है. वो अपनी युवा रिपोर्टर की हिम्मत को देखकर अपने पुराने दिनों को याद करता है, मगर बोर्डरूम के भारी दबाव के आगे उसकी भी रीढ़ झुकने लगती है. शेखर सुमन ने एक कॉर्पोरेट बॉस के रूप में बहुत नपी-तुली अदाकारी की है. अगर फिल्म इन दोनों के बीच के वैचारिक टकराव और पत्रकारिता के नैतिक पतन पर ज्यादा टिकती, तो शायद कहीं ज्यादा धारदार बन सकती थी. दूसरी तरफ, परिणीति चोपड़ा भी अपने किरदार को न्याय देने की कोशिश करती हैं. अमोल पालेकर अपने छोटे से रोल में हमेशा की तरह गरिमा बनाए रखते हैं.
देखें या नहीं?
ये उन फिल्मों में से कतई नहीं है जो आपको पलक झपकाने का मौका न दें या फोन हाथ से छूटने पर मजबूर कर दें. इसे देखते हुए ऐसा कोई खिंचाव महसूस नहीं होता कि आप अपनी जगह से हिल न सकें, बल्कि कई जगह कहानी इतनी ढीली पड़ती है कि आप सीरीज की तरह इसे बीच में पॉज़ करके घर का कोई काम निपटा लें, फोन स्क्रॉल कर लें और फिर दो-तीन किश्तों में आराम से देखें, तब भी कोई खास मलाल नहीं होता.

कैसी है सीरीज?
दरअसल ‘रिपोर्टिंग लाइव’ उस अख़बार जैसी है जिसकी हेडलाइन तो बहुत धमाकेदार थी, मगर अंदर की खबर बासी और अधूरी रह गई. न्यूज़रूम की मजबूरी और माफिया के काले खेल पर एक पैनी, रूह कंपा देने वाली फिल्म बनाई जा सकती थी. लेकिन सतही रिसर्च, मेलोड्रामा के मोह और एक बेदम मुख्य किरदार की वजह से यह सिर्फ एक औसत और देखी-भाली कहानी बनकर सिमट जाती है. मीडिया के कॉर्पोरेट खेल को समझने के लिए अगर आप बहुत ज्यादा उम्मीदें न पालें, तो कलाकारों की अच्छी एक्टिंग के लिए इसे एक बार देखा जा सकता है.




