अफगानिस्तान से दोस्ती क्यों बढ़ा रहा ब्रिटेन और रूस? बंद दरवाजे के पीछे के खेल को समझिए
यूरोपीय देशों का रुझान अफगानिस्तान की ओर बढ़ रहा है. रूस और ब्रिटेन के दूत ने बुधवार को काबुल में विदेश मंत्री मुताकी से मुलाकात की. 2021 के बाद पहली बार पी-2 देशों के दो दूत एक ही दिन काबुल आए थे. मुताकी की दोनों से लंबी बातचीत हुई है.
अरब में तनाव और ईरान युद्ध के खतरे के बीच ब्रिटेन और रूस जैसे देशों ने अफगानिस्तान का रुख किया है. बुधवार को ब्रिटेन और रूस के दूतों ने काबुल में अफगानिस्तान के कार्यवाहक विदेश मंत्री आमिर खान मुताकी से मुलाकात की. 2021 में तालिबान की सत्ता में वापसी के बाद पहली बार पी-2 देशों के दूत एक ही दिन काबुल में अफगानिस्तान के साथ बैठक करने पहुंचे थे. इस मुलाकात को इसलिए भी अहम माना जा रहा है, क्योंकि अफगानिस्तान इस समय दो मोर्चों पर बुरी तरह घिरा हुआ है. एक तरफ पाकिस्तान उस पर हमले कर रहा है, और दूसरी तरफ ईरान युद्ध के चलते उसकी दूसरी सीमा भी अशांत है.
हालांकि, सवाल ब्रिटेन और रूस के नई स्ट्रैटजी को लेकर है. आखिर दोनों देशों ने 4 साल बाद अफगानिस्तान का रूख क्यों किया है? रूस ने कुछ महीने पहले तालिबान को मान्यता देने की घोषणा की थी.
तालिबान से दोस्ती क्यों बढ़ा रहा ब्रिटेन?
ब्रिटेन की सबसे बड़ी समस्या अफगानिस्तान के शरणार्थी हैं. 2021 में तालिबान की सरकार आने के बाद करीब 85 हजार अफगानी लंदन और उसके आसपास बस गए. ब्रिटेन पर इन शरणार्थियों को वापस भेजने का दबाव है. ब्रिटेन सरकार के गृह मंत्री ने इस महीने की शुरुआत में कहा था कि हम जल्द ही इसको लेकर तालिबान सरकार से बात करेंगे.
ब्रिटेन की कोशिश है कि इन शरणार्थियों को किसी भी तरह अफगानिस्तान भेज दिया जाए. इसी को लेकर बुधवार को काबुल में स्टार्मर के दूत अफगानिस्तान के विदेश मंत्री से मिले थे.
अफगानिस्तान पर रूस की नजर क्यों है?
1989 से पहले तक अफगानिस्तान पर रूस का कंट्रोल था, लेकिन सोवियत-अफगान वार के दौरान रूस को यहां से जाना पड़ा. इसके बाद तालिबान की सरकार आई. 2001 में अमेरिका पर हमले के बाद वाशिंगटन ने तालिबान के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. इसके बाद अमेरिका तालिबान का दुश्मन हो गया. तालिबान ने 20 साल की लड़ाई के बाद 2021 में अमेरिका को पस्त कर दिया.
इसके बाद तालिबान नया दोस्त तलाश रहा है. रूस की कोशिश उससे दोस्ती बढ़ाने की है. अफगानिस्तान को खनिज संपन्न देश माना जाता है. अनुमान के मुताबिक उसके पास करीब 1.4 मिलियन टन रेयर अर्थ मिनरल्स है. तालिबान के पास तांबे और सोने का भी भंडार है.
अफगानिस्तान की जियोग्राफी भी उसकी एक अहम ताकत है. अफगानिस्तान एशिया के सेंटर में स्थित है. इसके जरिए चीन, पाकिस्तान, ईरान और मध्य एशिया के देशों में आसानी से पहुंचा जा सकता है.
ईरान को लेकर दोनों देशों का अमेरिका से पंगा
अमेरिका की नजर ईरान पर है. यहां तख्तापलट के लिए उसने जंग छेड़ दी है. हालांकि, अब तक अमेरिका को इसमें सफलता नहीं मिल पाई है. दूसरी तरफ रूस और ब्रिटेन ईरान को लेकर अमेरिका के रुख का विरोध कर रहा है.
इन देशों को डर है कि अगर कहीं अमेरिका ने ईरान पर कंट्रोल कर लिया, तो पश्चिम एशिया में इनकी मुसीबत बढ़ सकती है. इसलिए दोनों ने अभी से अफगानिस्तान को साधने की कवायद शुरू कर दी है.
क्योंकि ईरान के पड़ोस में जो भी देश हैं—जैसे पाकिaस्तान, अज़रबैजान और आर्मेनिया—वे सभी अमेरिका के करीबी हैं.




