Crime Patrol 2026 Review: क्राइम पेट्रोल के होस्ट की भूमिका में अजय देवगन लगे दमदार, पर ये चूक भारी न पड़ जाए
Crime Patrol Review: क्राइम पेट्रोल 2026 से अजय देवगन ने टीवी पर अपना डेब्यू किया है. अगर आप ये शो सोनी टीवी पर देखने का प्लान बना रहे हैं, तो इससे पहले ये रिव्यू ज़रूर पढ़े.
Crime Patrol 2026 Review: भारतीय टेलीविजन इतिहास में ‘क्राइम पेट्रोल’ केवल एक शो नहीं, बल्कि समाज के भीतर छिपे काले सच को सामने लाने वाला एक सशक्त आईना रहा है. 2026 के नए सीजन में जब बॉलीवुड के ‘सिंघम’ यानी अजय देवगन ने इस शो की कमान संभाली, तो उम्मीदों का आसमान छूना स्वाभाविक था. टीवी का ये नया सीजन न सिर्फ अपने होस्ट के बड़े स्टारडम को लेकर चर्चा में है, बल्कि उन विषयों को लेकर भी जिनमें अपराध की पुरानी, घिसी-पिटी और प्रेडिक्टेबल कहानियों को छोड़कर आज के दौर की कड़वी हकीकत को सामने रखा गया है. क्या अजय देवगन की मौजूदगी ने इस शो को नई ऊंचाई दी है या अनूप सोनी की छोड़ी हुई विरासत के सामने ये सीजन कहीं बिखरता दिखता है? आइए इस पर विस्तार से चर्चा करते हैं.
इस सीजन की सबसे बड़ी ताकत इसके विषय का चयन (टॉपिक सिलेक्शन) है. शो के मेकर्स ने इस बार ये समझदारी दिखाई है कि वो 90 के दशक या पुरानी रंजिशों के ट्रेडिशनल अपराधों में नहीं उलझे. पहले एपिसोड ‘बगावत’ से ही ये साफ हो जाता है कि फोकस आज की डिजिटल दुनिया पर है.
रील्स का नशा, एक स्वाइप पर बदलते इमोशंस और सोशल मीडिया से पैदा होने वाली असुरक्षा, ये ऐसे मुद्दे हैं जो सीधे तौर पर आज के हर घर और स्मार्टफोन स्क्रीन से जुड़े हैं. पहले एपिसोड की कहानी इतनी रिलेटेबल है कि दर्शक स्क्रीन देखते हुए यह सोचने पर मजबूर हो जाते हैं कि ये हादसा उसके अपने पड़ोस या परिवार में भी हो सकता था. विषय चयन के मामले में ये सीजन पूरे नंबर ले जाता है.
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अजय देवगन का ऑरा
मेकर्स का अजय देवगन को बतौर होस्ट चुनना एक बहुत बड़ा मास्टरस्ट्रोक साबित होता है. स्क्रीन पर आते ही उनका वही ट्रेडमार्क ठहराव, आंखों की गंभीरता और भारी-भरकम आवाज समां बांध देती है. वो किसी उपदेशक की तरह भाषण नहीं देते, बल्कि एक जिम्मेदार नागरिक की तरह सवाल खड़े करते हैं. जब वो कहते हैं कि क्या हमारे इमोशंस भी अब स्क्रोल होने लगे हैं? तो उनकी आवाज की गहराई सीधे दिल पर वार करती है. उनकी स्क्रीन प्रेजेंस में वो वजन है, जो एक क्राइम-अवेयरनेस शो के होस्ट में होनी चाहिए.
जहां चूक गया शो
मजबूत कहानियों और अजय देवगन के स्टारडम के बावजूद, शो का सबसे कमजोर सिरा इसकी ‘एंकरिंग कनेक्टिविटी’ बनकर सामने आता है. सालों तक दर्शकों ने अनूप सोनी को इस शो की धड़कन बनते देखा है. अनूप सोनी की सबसे बड़ी खूबी ये थी कि वो कहानी के भीतर मौजूद लगते थे. उनकी होस्टिंग ऑन-लोकेशन होती थी, उसी संकरी गलियों में, उसी पुलिस स्टेशन के बाहर या उस अपराध स्थल पर जहां घटना घटी हो. इससे दर्शक कहानी और होस्ट के बीच एक जुड़ाव महसूस करता था.
अजय देवगन के साथ ये लिंक टूटा हुआ और डिस्कनेक्टेड नजर आता है. स्क्रीन पर साफ महसूस होता है कि अजय के एंकर लिंक्स किसी हाई-एंड स्टूडियो या पूरी तरह अलग लोकेशन पर भारी क्रू के साथ शूट किए गए हैं, जबकि कहानी की दुनिया जमीन पर किसी और गांव या शहर में चल रही है. कहानी और होस्ट के बीच ये फासला खटकता है. अजय कहानी के सूत्रधार कम और किसी बाहरी टिप्पणीकार (कमेंटर) की तरह ज्यादा प्रतीत होते हैं, जिससे वो ‘ग्राउंडेड फील’ गायब हो जाता है जो क्राइम पेट्रोल की आत्मा हुआ करता था.
सिनेमाटोग्राफी, डायरेक्शन और परफॉर्मेंस
तकनीकी मोर्चे पर शो ने बड़ा अपग्रेड हासिल किया है. दृश्यों का टोन रेलटेबल है. कलाकारों की एक्टिंग लाउड होने के बजाय बहुत सहज है. बैकग्राउंड स्कोर भी चीखने-चिल्लाने वाला नहीं है, बल्कि सस्पेंस और डर के माहौल को खूबसूरती से बढ़ाता है.
फाइनल वर्डिक्ट
अजय देवगन का स्टारडम और आज के दौर के असली मुद्दे दोनों मिलकर ‘क्राइम पेट्रोल’ के इस नए सीजन को असरदार बनाते हैं. थोड़ी-बहुत कमियों को छोड़ दें तो शो अपने मकसद में पूरी तरह कामयाब रहता है. ये सिर्फ एक टीवी शो नहीं, बल्कि समाज के लिए एक ऐसी चेतावनी है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.




