‘सैराट’ फेम रिंकू राजगुरु और शांतनु माहेश्वरी की ‘सहिया’ पर सेंसर बोर्ड की रोक, नक्सलवाद के आरोप पर भड़के मेकर्स, दी कोर्ट की चेतावनी!
'सैराट' फेम रिंकू राजगुरु और शांतनु माहेश्वरी की फिल्म 'सहिया' के सर्टिफिकेशन पर सेंसर बोर्ड ने रोक लगा दी है. नक्सलवाद के आरोपों को खारिज करते हुए मेकर्स ने हाई कोर्ट जाने की चेतावनी दी है.
मराठी ब्लॉकबस्टर ‘सैराट’ से पूरे देश में पहचान बनाने वाली अभिनेत्री रिंकू राजगुरु और ‘गंगूबाई काठियावाड़ी’ फेम शांतनु माहेश्वरी की आगामी हिंदी फीचर फिल्म ‘सहिया’ रिलीज से पहले ही विवादों के घेरे में आ गई है. केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) ने फिल्म में नक्सलवाद और जरूरत से ज्यादा हिंसा की आशंका जताते हुए इसके सर्टिफिकेशन पर रोक लगा दी है. इस फैसले के बाद टीवी9 हिंदी डिजिटल के साथ की बातचीत में फिल्म के निर्माता-निर्देशक संजय शर्मा ने सेंसर बोर्ड की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए कानूनी लड़ाई लड़ने का ऐलान कर दिया है.
फिल्म में रिंकू राजगुरु, शांतनु माहेश्वरी और दिग्गज एक्टर नीरज काबी मुख्य भूमिकाओं में हैं. फिल्म की कहानी झारखंड के नक्सल प्रभावित इलाके की पृष्ठभूमि पर आधारित है, जहां एक आम आदिवासी पति-पत्नी अपनी जान बचाने और संघर्ष से बाहर निकलने की कोशिश करते हैं. सेंसर बोर्ड की आपत्तियों को सिरे से खारिज करते हुए मेकर्स ने साफ किया कि फिल्म किसी भी तरह से हथियार या नक्सलवाद का समर्थन नहीं करती. मेकर्स का कहना है कि सिर्फ कहानी का बैकड्रॉप आदिवासी अंचल होने का मतलब ये नहीं है कि वह नक्सलवाद का महिमामंडन कर रही है. फिल्म का मूल संदेश हिंसा का विरोध और मानवीय रिश्तों का संघर्ष ही दिखाया गया है.
प्रायोरिटी फीस के बावजूद 41 दिनों की देरी का आरोप
मुंबई में हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान निर्माताओं ने आरोप लगाया कि उन्होंने तय नियमों के तहत अतिरिक्त शुल्क चुकाकर प्रायोरिटी स्कीम में आवेदन किया था. इसके बावजूद फिल्म की स्क्रीनिंग में 41 दिनों से ज्यादा का समय लग गया. निर्माताओं ने सवाल उठाया कि बड़े बजट की फिल्मों में खुलेआम हिंसा दिखाने पर आंखें मूंद ली जाती हैं, लेकिन जब कोई स्वतंत्र फिल्मकार आदिवासियों की जमीनी हकीकत पर संवेदनशील सिनेमा बनाता है, तो उसे महीनों तक दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ते हैं.
बंद कमरे में बैठक और फोन बाहर रखवाने पर ऐतराज
मेकर्स ने सर्टिफिकेशन प्रक्रिया की पारदर्शिता पर भी आपत्ति दर्ज कराई. उनका आरोप है कि स्क्रीनिंग के बाद जब उन्हें चर्चा के लिए बुलाया गया, तो उनके मोबाइल फोन बाहर रखवा लिए गए. मेकर्स ने मांग की कि बोर्ड को साफ तौर पर टाइमस्टैंप के साथ बताना चाहिए कि किस सीन या डायलॉग पर आपत्ति है, न कि सामान्य धाराओं का हवाला देकर पूरी फिल्म को लटका दिया जाए.
फैसला न बदलने पर हाई कोर्ट जाने की तैयारी
निर्माता संजय शर्मा ने स्पष्ट किया है कि उन्होंने सीबीएफसी के सामने अपना पक्ष रख दिया है. अगर बोर्ड अपने फैसले पर पुनर्विचार कर जल्द सर्टिफिकेट जारी नहीं करता, तो वे अपने संवैधानिक अधिकारों के तहत बॉम्बे हाई कोर्ट का रुख करेंगे. अब देखना होगा कि रिंकू राजगुरु और शांतनु माहेश्वरी की इस फिल्म पर सेंसर बोर्ड का अगला कदम क्या होता है.




