भारत में भारतीय फिल्मों पर कैसे भारी पड़ रही हैं हॉलीवुड फिल्में? इन 5 पॉइंट्स में छिपा है सक्सेस का राज
Why Hollywood movies succeed in India: भारत में हॉलीवुड की फिल्में बॉक्स ऑफिस पर खूब धमाल मचाती हैं. यही वजह है कि शायद इन फिल्मों के साथ कोई बड़ी इंडियन फिल्म रिलीज भी नहीं होती है.
Hollywood Movies Success In India: भारतीय बॉक्स ऑफिस पर कुछ वक्त से एक हैरान कर देने वाला ट्रेंड देखने को मिल रहा है. जिस देश के दर्शक कभी सिर्फ और सिर्फ भारतीय फिल्मों के फर्स्ट-डे फर्स्ट-शो के लिए थिएटर्स के बाहर मारपीट तक कर लिया किया करते थे, अब उसी देश के मल्टीप्लेक्स में क्रिस्टोफर नोलन की ‘ओपनहाइमर’, मार्वल की ‘स्पाइडर-मैन’ और जेम्स कैमरून की ‘अवतार’ जैसी हॉलीवुड फिल्मों का जादू सिर चढ़कर बोल रहा है. सैकड़ों करोड़ के भारी-भरकम बजट में बनने के बावजूद हमारी (इंडियन सिनेमा) कई बड़ी फिल्में अपने ही घरेलू मैदान पर फ्लॉप साबित हो रही हैं, जबकि हॉलीवुड फिल्में यहां से मुनाफा छापकर ले जा रही हैं.
आखिर इंडियन मार्केट में हॉलीवुड की इस बंपर सफलता का सीक्रेट क्या है? हॉलीवुड फिल्मों के सामने इंडियन फिल्में क्यों पिछड़ रही हैं? आइए 5 प्वाइंट्स में इसे डिकोड करते हैं.
1. बजट का सही इस्तेमाल और एडवांस तकनीक
हॉलीवुड की सफलता का सबसे पहला और बड़ा राज उनके बजट का सही बंटवारा है. अगर हॉलीवुड में किसी पिक्चर पर 200 मिलियन डॉलर (लगभग 1900 करोड़ रुपये) खर्च होते हैं, तो उसका 70-80% हिस्सा सीधे पर्दे पर दिखता है, यानी वर्ल्ड-क्लास VFX, तकनीक और प्रोडक्शन क्वालिटी पर पैसे खर्च होते हैं. उदाहरण के तौर पर ‘अवतार: द वे ऑफ वॉटर’ या ‘ड्यून’ जैसी फिल्मों का एक-एक फ्रेम ये साबित करता है कि पैसे टेक्नोलॉजी पर लगे हैं. इतना ही नहीं, हॉलीवुड में ‘ऑब्सेशन’ या ‘गेट आउट’ जैसी कम बजट की फिल्में भी अपनी मजबूत राइटिंग और बेहतरीन मेकिंग के दम पर तहलका मचा देती हैं.
इसके ठीक उलट, भारत में अगर 300-400 करोड़ रुपये का बजट होता है, तो उसका 40 से 50 फीसदी हिस्सा (और कभी-कभी इससे भी ज्यादा) सिर्फ 1-2 बड़े सुपरस्टार्स की फीस में चला जाता है. नतीजतन, फिल्म की मेकिंग, विजुअल इफेक्ट्स और राइटिंग के लिए बजट कम पड़ जाता है, जिससे स्क्रीन पर क्वालिटी बेहद कमजोर और सस्ती नजर आती है.
दूसरी तरफ वहीं जब हमारे यहां विक्रम भट्ट जैसे मेकर्स कम बजट में हॉरर या थ्रिलर फिल्में बनाने उतरते हैं, तो सीमित साधनों, कमजोर VFX और वही घिसे-पिटे फॉर्मूलों के चक्कर में फिल्म पर्दे पर बेहद सस्ती और क्वालिटी के मामले में काफी कमजोर नजर आती है.
2. विजन का प्रेजेंटेशन भारतीय फिल्मों से बहुत आगे
सोच और आइडिया के मामले में भारतीय सिनेमा पीछे नहीं है, लेकिन जब बात उस विजन को पर्दे पर उतारने की आती है, तो रायता फैल जाता है. हॉलीवुड फिल्मों में स्टोरीटेलिंग, यूनिक कॉन्सेप्ट्स और स्क्रीनप्ले पर सालों तक रिसर्च और काम होता है. वे जो सोचते हैं, उसे 100% परफेक्शन के साथ स्क्रीन पर उतार देते हैं.
दूसरी तरफ, हमारे यहां 600 करोड़ के बजट में बनी ‘आदिपुरुष’ इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. मेकर्स की तरफ से ‘रामायण’ जैसी महान गाथा को पर्दे पर लाने का दावा तो किया गया, लेकिन कमजोर विजन और बचकाने विजुअल्स के कारण दर्शकों ने इसे सिरे से खारिज कर दिया. हालांकि ‘कल्कि 2898 AD’ और ‘ब्रह्मास्त्र’ जैसी फिल्मों ने इस दिशा में बेहतर प्रयास किया, लेकिन अपने यहां अक्सर बड़े बड़े मेकर्स में हिट फिल्मों के फार्मूले (मसाला, रीमेक, या जबरन के एक्शन) को कॉपी करने की होड़ मच जाती है, जिससे दर्शक ऊब चुके हैं.
3. ओटीटी के आने से हॉलीवुड का हुआ फायदा
कोरोना महामारी के बाद से भारत में ओटीटी प्लेटफॉर्म्स का दायरा काफी तेजी से फैला है. आज जनरेशन-जी (Gen-Z) और बाकी अर्बन ऑडियंस घर बैठे नेटफ्लिक्स और प्राइम वीडियो जैसे माध्यमों पर ग्लोबल कंटेंट आसानी से देख पा रहे हैं. भारतीय दर्शक अब रॉबर्ट डाउनी जूनियर, क्रिस हेम्सवर्थ और टॉम क्रूज जैसे हॉलीवुड एक्टर्स के काम से अच्छी तरह वाकिफ हो चुके हैं.
जब ओटीटी के जरिए किसी हॉलीवुड स्टार या फ्रेंचाइजी का क्रेज भारत में बनता है, तो जब भी उनकी कोई नई फिल्म थिएटर्स में रिलीज होती है, तो दर्शक टिकट खरीदकर उसे बड़े पर्दे पर भी देखना पसंद करते हैं. इसका सीधा फायदा ‘स्पाइडर-मैन: नो वे होम’ और ‘गार्डियंस ऑफ द गैलेक्सी’ जैसी फिल्मों को इंडियन बॉक्स ऑफिस पर मिला है. आज भारतीय थिएटर्स से 60-70% रेवेन्यू अर्बन मल्टीप्लेक्स और 15-35 साल के यूथ से आता है. हॉलीवुड सीधे इसी जनरेशन को टारगेट करता है.
4. कंटेंट इज किंग
हॉलीवुड फिल्मों की सबसे बड़ी यूएसपी उनका यूनिवर्स और फ्रेंचाइजी ब्रांडिंग है. मार्वल यूनिवर्स (MCU), डीसी (DC), ‘फास्ट एंड फ्यूरियस’, ‘जुरासिक पार्क’ या ‘जेम्स बॉन्ड’ जैसी फिल्में इसका जीता-जागता सबूत हैं. वहां कंटेंट और फ्रेंचाइजी के नाम पर फिल्में चलती हैं, सिर्फ किसी एक स्टार के चेहरे पर नहीं. यही वजह है कि ‘जेम्स बॉन्ड’ का हीरो बदल जाता है, लेकिन फिल्म का क्रेज कभी कम नहीं होता.
हमारे यहां फिल्में आज भी स्टैंड-अलोन (यानी सिर्फ स्टार पावर) पर टिकी हैं. ‘धूम’, ‘मैडॉक हॉरर-कॉमेडी यूनिवर्स’ या ‘YRF स्पाई यूनिवर्स’ जैसे कुछ अपवादों को छोड़ दें तो हमारे यहां हर कोई ऐसा रिस्क उठाने से कतराता है.
5. सिर्फ तकनीक नहीं रिएयलिस्टिक अप्रोच पर करते हैं भरोसा
हॉलीवुड के पास वॉल्यूम-एलईडी स्क्रीन्स और ऐसी ऑगमेंटेड टेक्नोलॉजी है कि वे अमेरिका के बंद स्टूडियो में बैठकर पूरी मुंबई या बनारस का नजारा दिखा सकते हैं. लेकिन इसके बावजूद क्रिस्टोफर नोलन जैसे महान निर्देशक अपनी ‘ओपनहाइमर’ जैसी फिल्मों में बिना किसी CGI (कंप्यूटर ग्राफिक्स) के कहानी कहते हैं और IMAX कैमरों के साथ रियल लोकेशंस पर शूट करते हैं.
60 की उम्र पार कर चुके टॉम क्रूज ‘मिशन: इम्पॉसिबल’ में अपने जानलेवा स्टंट्स खुद परफॉर्म करते हैं. वहां टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल फिल्म को निखारने के लिए होता है, उस पर पूरी तरह निर्भर होने के लिए नहीं. इसके विपरीत, हमारे यहां आलस में हर सीन को ग्रीन स्क्रीन और घटिया सीजीआई के भरोसे छोड़ दिया जाता है. हालांकि, जब भारत में ‘कांतारा’ जैसी फिल्म आती है, जो जमीन से जुड़ी लोककथा और रियल लोकेशंस (रूटेड रियलिज्म) पर भरोसा जताती है, तो दर्शक उसे भी सिर आंखों पर बिठाते हैं. लेकिन ऐसी कोशिशें हमारे यहां बहुत कम देखने को मिलती हैं.
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इन दिनों भारतीय बॉक्स ऑफिस पर ‘स्पाइडर-मैन: ब्रांड न्यू डे’ और ‘द ओडिसी’ जैसी बड़ी हॉलीवुड फिल्मों का बोलबाला देखने को मिल रहा है. ‘ब्रांड न्यू डे’ भारत में सिर्फ चार दिनों में 250 करोड़ रुपये से ज्यादा का बिजनेस कर चुकी हैं. ‘द ओडिसी’ ने भी 16 दिनों में भारत में तकरीबन 150 करोड़ रुपये कमाए हैं. इन दो हॉलीवुड फिल्मों ने एक बार फिर साबित कर दिया कि अगर काम सही दिशा में हो, तो किसी भी देश में अपने पैर जमाए जा सकते हैं.




