Prem Keetanu Review: कॉलेज की यारी, पहला क्रश और दिल टूटने का दर्द, कैसी है वीर पहाड़िया और आफिया सैयद की लव स्टोरी?

Prem Keetanu Review: कॉलेज की यारी, पहला क्रश और दिल टूटने का दर्द, कैसी है वीर पहाड़िया और आफिया सैयद की लव स्टोरी?

Prem Keetanu Review: बनारस के अल्हड़पन से दिल्ली के कॉर्पोरेट दफ्तरों तक दौड़ती 'प्रेम कीटाणु' क्या जवानी के सुनहरे दिनों की याद दिला पाती है? पढ़िए वीर पहाड़िया-आफिया की फ्रेश लव स्टोरी का रिव्यू.

Prem Keetanu Review: कॉलेज की वो पहली कैंटीन वाली चाय, पहले दिन का टशन, क्लास बंक करके की गई आवारागर्दी और सबसे बढ़कर… वो पहला क्रश, जिसे देखते ही पेट में तितलियां उड़ने लगती थीं. जवानी के उस दौर की सबसे बड़ी खूबसूरती यही होती है कि वहां दिल टूटने का गम भी दुनिया की सबसे बड़ी जंग जैसा लगता है और यारों की महफिल सबसे बड़ा सहारा. इसी कच्ची उम्र के जज्बातों की नब्ज टटोलने आई है फिल्म ‘प्रेम कीटाणु’.

‘सिर्फ एक बंदा काफी है’ जैसी फिल्म बनाने वाले अपूर्व सिंह कार्की ने इस बार गंभीर अदालती दांव-पेंच छोड़कर कॉलेज के गलियारों का रुख किया है. साथ में लीड रोल में उतारा है वीर पहाड़िया को, जो अपनी सोल्जर वाली भारी-भरकम डेब्यू छवि से निकलकर एक दम अल्हड़, लापरवाह और कॉलेजिया लौंडे के रोल में नजर आ रहे हैं. सामने हैं नई नवेली आफिया सैयद. अब सवाल ये है कि क्या यह फिल्म वही पुरानी घिसी-पिटी फॉर्मूला लव स्टोरी बनकर रह जाती है, या फिर इसमें वाकई वो ‘प्रेम का कीटाणु’ है जो दर्शकों के दिल में मीठी गुदगुदी पैदा कर सके? चलिए इस पर विस्तार से बात करते हैं.

कहानी

कहानी की शुरुआत होती है बनारस की उस अल्हड़ माटी से, जहां पढ़ाई-लिखाई से कोसों दूर भागने वाला विशाल (वीर पहाड़िया) किसी तरह ‘बनारस इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी’ की चौखट लांघता है. विशाल की जिंदगी का फंडा सीधा है कि मौज पूरी रहे, बाकी देखा जाएगा. कॉलेज के पहले ही दिन उसकी टक्कर होती है बेहद तेजतर्रार, संजीदा और अपनी शर्तों पर जीने वाली सुहानी शर्मा (आफिया सैयद) से. पहली मुलाकात में ही दोनों के बीच ऐसी खटपट होती है कि बात ईगो पर आ जाती है. तैश में आकर दोनों एक-दूसरे को चार साल तक सिंगल रहने का खुला चैलेंज दे डालते हैं.

मगर जिंदगी अपनी ही रफ्तार से चलती है. सुहानी अपनी काबिलियत के दम पर दिल्ली के बड़े कॉलेज में दाखिला ले लेती है और आगे चलकर एक नामी सॉफ्टवेयर कंपनी में अच्छी नौकरी पा जाती है. दूसरी तरफ विशाल वहीं बनारस में बैकलॉग और करियर की चिंताओं के बीच हाथ-पैर मारता रहता है. कुछ सालों बाद, विशाल जब अमेरिका जाकर पढ़ाई करने का सपना देखता है और वीजा के लिए खाते में पांच लाख रुपये दिखाने की मारामारी शुरू होती है, तो किस्मत उसे खींचकर दिल्ली ले आती है.

Veer Pahariya

वीर पहाड़िया और आफिया

दिल्ली की इस अजनबी भीड़ में विशाल और सुहानी फिर आमने-सामने होते हैं. मगर इस बार पुरानी तल्खी की जगह एक अनकही गर्माहट आ चुकी है. पेंच तब फंसता है जब सुहानी का बॉस रंजीत (अपारशक्ति खुराना) बीच में आ धमकता है. रंजीत के दिल में सुहानी के लिए पहले से ही घंटी बज रही है, और विशाल की एंट्री उसकी इनसिक्योरिटी को भड़का देती है. इसके बाद शुरू होती है गलतफहमियों, टशन और टूटे हुए दिलों की वो कहानी जिससे देखने के लिए आपको थिएटर जाना होगा.

कैसी है फिल्म?

‘प्रेम कीटाणु’ की सबसे बड़ी खूबी ये है कि ये खुद को बेवजह का बड़ा ड्रामा साबित करने का ढोंग नहीं करती. ये बहुत सहजता से शुरू होती है और हॉस्टल के लड़कों की उसी मस्ती, बेतुकी बहसों और टांग-खिंचाई के जरिए आगे बढ़ती है जिसे हर उस शख्स ने जिया होगा जो कभी कॉलेज गया है. अगर आपने मलयालम की चर्चित फिल्म ‘प्रेमालु’ देखी है, तो आपको इसका फ्लेवर काफी हद तक उसी सांचे में ढला हुआ महसूस होगा, लेकिन इसे बनारस और दिल्ली के देसी तड़के में बहुत अच्छे से पकाया गया है.

फिल्म का पहला हाफ पूरी तरह से लड़कों की बदमाशी, कॉलेज के लतीफों और एक-दूसरे को नीचा दिखाने की होड़ में सरपट भागता है. संवादों में वही देसीपन है जो किसी भी आम हॉस्टल के कमरे में सुनने को मिलता है. लेकिन इंटरवल के बाद जब कहानी दिल्ली के कॉरपोरेट माहौल में कदम रखती है, तो टोन हल्का सा सीरियस होता है. यहां प्यार, करियर की उलझनें और फिर दिल टूटने का वो दर्द सामने आता है जो युवा दर्शकों को आसानी से अपनी ओर खींच लेता है. रफ्तार कहीं-कहीं थोड़ी डगमगाती है, खासकर जब फिल्म रोमांस से अचानक भारी इमोशन की ओर मुड़ती है, मगर गाड़ी इतनी भी पटरी से नहीं उतरती कि देखने वाला बोर हो जाए.

निर्देशन और राइटिंग

निर्देशक अपूर्व सिंह कार्की ने इस जॉनर को बहुत हल्का-फुल्का और रंगीन बनाए रखा है. उन्होंने अपनी स्क्रिप्ट को फालतू के उपदेशों से लादने के बजाय किरदारों की रोजमर्रा की बातचीत को ही कहानी की ताकत बनाया है. लड़कों के बीच की जो केमिस्ट्री और अनफ़िल्टर्ड हंसी-मज़ाक है, वो पर्दे पर बिल्कुल बनावटी नहीं लगता. गौरव वर्मा की राइटिंग में कॉलेजिया युवाओं की भाषा की अच्छी पकड़ दिखती है.

Apaarshakti And Rakesh Bedi

अपारशक्ति खुराना का कॉमिक अंदाज

कमजोरी बस इतनी है कि कहानी में कई मोड़ ऐसे हैं जिनका अंदाजा आप दस मिनट पहले ही लगा सकते हैं. सुहानी के बॉस की जलन और विशाल की नादानियों की वजह से रिश्तों में दरार पड़ना, ये वो फॉर्मूले हैं जो हमने दर्जनों फिल्मों में देखे हैं. फिर भी, किरदारों के बीच की नोक-झोंक इस बासीपन को काफी हद तक ढक लेती है. इस फिल्म का म्यूजिक भी अच्छा है.

एक्टिंग

‘स्काई फोर्स’ जैसी फिल्म के बाद वीर पहाड़िया के लिए ये किरदार बिल्कुल उल्टे छोर पर खड़ा था. उन्होंने विशाल के इस लापरवाह और पंगेबाज अवतार को काफी हद तक सहजता से निभाया है. कॉमिक दृश्यों में उनकी टाइमिंग अच्छी है और स्क्रीन पर उनकी मौजूदगी में एक खिंचाव दिखता है. हालांकि, जहां बहुत गहरे जज्बात और आंसू दिखाने की बारी आई, वहां उनकी एक्टिंग में थोड़ी और डेप्थ चाहिए थी, लेकिन एक चुलबुले लड़के के तौर पर वे अपनी छाप छोड़ जाते हैं.

आफिया सैयद इस पूरी फिल्म में ताजी हवा के झोंके की तरह आती हैं. सुहानी के रोल में उनकी सादगी, प्यारी सी मुस्कान और आंखों का ठहराव दर्शकों को बांध लेता है. वीर के साथ उनकी केमिस्ट्री जबरन थोपी हुई नहीं लगती, बल्कि दोनों के बीच की झिझक और फिर धीरे-धीरे खिलता प्यार परदे पर बहुत स्वाभाविक लगता है. वहीं अपारशक्ति खुराना जब भी फ्रेम में आते हैं, तब तब फिल्म और मजेदार बन जाती है. एक इनसिक्योर और ओवर-स्मार्ट बॉस के रोल में उन्होंने अपने खास अंदाज से कई सीन्स में खूब जान फूंकी है. बाकी दोस्तों का गैंग भी अपनी-अपनी जगह पर ठीक-ठाक रंग जमा देता है.

क्यों देखें और क्यों न देखें

अगर आप कॉलेज के वो बेफिक्र दिन, पहली मोहब्बत की सिहरन और यारों की मस्ती को दोबारा महसूस करना चाहते हैं तो ये फिल्म आपके लिए है. लेकिन अगर आप किसी बहुत ही अनोखी या लीग से हटकर लिखी गई प्रेम कहानी की तलाश में हैं, क्योंकि प्लॉट काफी हद तक प्रेडिक्टेबल है. दूसरे हाफ में कुछ जगहों पर कहानी की रफ्तार सुस्त पड़ती है और ड्रामा थोड़ा खिंचा हुआ महसूस होता है.

Rakesh Bedi Role

राकेश बेदी का रोल

कुल मिलाकर ‘प्रेम कीटाणु’ कोई ऐसा सिनेमा नहीं है जो दुनिया बदलने का दावा करता हो, और न ही यह किसी बड़े अवॉर्ड की दौड़ में शामिल होने के लिए बनाई गई है. ये तो एक मीठी सी नॉस्टैल्जिया है, जो आपको उस दौर में वापस ले जाती है जब किसी की एक मुस्कान पर पूरा दिन बन जाता था और दोस्तों की गाली में भी अपनापन झलकता था. कुछ जानी-पहचानी कमजोरियों और प्रेडिक्टेबल मोड़ों के बावजूद, यह फिल्म अपने युवाओं वाले जोश और साफ-सुथरे जज्बातों के दम पर चेहरे पर मुस्कान छोड़ने में कामयाब रहती है. अगर इस वीकेंड पर कोई हल्की-फुल्की, सुकून देने वाली और दिल को छू लेने वाली लव स्टोरी देखने का मन है, तो इस फिल्म के साथ एक मुलाकात जरूर की जा सकती है.

सोनाली नाईक
सोनाली नाईक

सोनाली करीब 15 सालों से पत्रकारिता की दुनिया में सक्रिय हैं. जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी करने के बाद प्रहार न्यूज पेपर से उन्होंने अपने करियर की शुरुआत की थी. इस न्यूज पेपर में बतौर रिपोर्टर काम करते हुए सोनाली ने एंटरटेनमेंट बीट के साथ-साथ सीसीडी (कॉलेज कैंपस और ड्रीम्स) जैसे नए पेज पर काम किया. उन्होंने वहां 'फैशनेरिया' नाम का कॉलम भी लिखा. इस दौरान एलएलबी की पढ़ाई भी पूरी की, लेकिन पत्रकारिता के जुनून की वजह से इसी क्षेत्र में आगे बढ़ने के इरादे से 2017 में टीवी9 से सीनियर कोरेस्पोंडेंट के तौर पर अपनी नई पारी शुरू की. टीवी9 गुजराती चैनल में 3 साल तक एंटरटेनमेंट शो की जिम्मेदारी संभालने के बाद सोनाली 2020 में टीवी9 हिंदी डिजिटल की एंटरटेनमेंट टीम में शामिल हुईं. सोनाली ने टीवी9 के इस सफर में कई ब्रेकिंग, एक्सक्लूसिव न्यूज और ऑन ग्राउंड कवरेज पर काम किया है. हिंदी के साथ-साथ गुजराती, मराठी, इंग्लिश भाषा की जानकारी होने के कारण डिजिटल के साथ-साथ तीनों चैनल के लिए भी उनका योगदान रहा है. रियलिटी शोज और ग्लोबल कंटेंट देखना सोनाली को पसंद है. नई भाषाएं सीखना पसंद है. संस्कृत भाषा के प्रति खास प्यार है. नुक्कड़ नाटक के लिए स्क्रिप्ट लिखना पसंद है. सोनाली के लिखे हुए स्ट्रीट प्लेज 'पानी', 'मेड इन चाइना' की रीडिंग 'आल इंडिया रेडियो' पर सोशल अवेयरनेस के तौर पर की जा चुकी है.

Read More