Drishyam The Conclusion Review: विजय सलगांवकर का आखिरी पैंतरा और पुलिस का शिकंजा, जानिए कैसी है आखिरी दृश्यम?

Drishyam The Conclusion Review: विजय सलगांवकर का आखिरी पैंतरा और पुलिस का शिकंजा, जानिए कैसी है आखिरी दृश्यम?

Drishyam 3 Review: खाकी और चौथी पास विजय सलगांवकर की ग्यारह साल पुरानी आंखमिचौली अपने अंतिम मुकाम पर आ पहुंची है. क्या ये आखिरी बाजी दर्शकों के होश उड़ा पाती है या सिर्फ पुराने दांव दोहराती है.

Drishyam The Conclusion Review: हिंदी सिनेमा के कुछ डायलॉग दर्शकों के जहन में ऐसे बस जाते हैं कि चाहकर भी भुलाए नहीं भूलते. जैसे ‘शोले’ का ‘कितने आदमी थे’ या ‘दीवार’ का ‘मेरे पास मां है’, वैसे ही पिछले ग्यारह सालों से बॉलीवुड फैन्स के दिमाग में 2 अक्टूबर की तारीख छप चुकी है. पणजी की बस, स्वामीजी का आश्रम, होटल की प्लेट में तैरती गर्म पावभाजी और सिनेमा हॉल का टिकट वाला डायलॉग देश का बच्चा-बच्चा जुबानी रट चुका है. जिस तरह से ‘डॉन’ को पकड़ना ग्यारह मुल्कों की पुलिस के लिए नामुमकिन था, ठीक वैसे ही विजय सलगांवकर को पकड़ने में भी क्राइम ब्रांच के पसीने छूट गए थे.

अब जब ‘दृश्यम: द कन्क्लूजन’ के साथ इस खेल की आखिरी घंटी बज चुकी है, तो हर दर्शक के मन में एक ही सवाल है, या विजय इस बार भी कानून के जबड़े से अपने परिवार को सुरक्षित निकाल ले जाएगा, या फिर ग्यारह साल से बिछाया गया उसका चक्रव्यूह आखिरकार ढह जाएगा? चलिए देखते हैं कि इस आखिरी दांव में कितना दम है.

कहानी

कहानी वहीं से आगे बढ़ती है जहां सैम की मौत के जख्म उसके परिवार के दिल में अब भी हरे हैं. सैम की मौत के गम में डूबी मीरा देशमुख (तबू) की जिंदगी एक जिंदा लाश जैसी हो चुकी है. उसके भीतर का दर्द इस बात से और गहरा जाता है कि एक मामूली केबल ऑपरेटर उसके इकलौते बेटे की लाश को अपनी अक्ल के दम पर गायब कर गया और सिस्टम हाथ मलता रह गया. इस बेबसी से आजिज आकर मीरा के पति (रजत कपूर) केस की फाइल दोबारा खुलवाने के लिए क्राइम ब्रांच के सबसे कड़क और शातिर अफसर राजवीर सिंह तोमर (जयदीप अहलावत) के दरवाजे पर दस्तक देते हैं. राजवीर कोई आम पुलिसवाला नहीं है, वह कागजों से ज्यादा इंसानी फितरत को सूंघने में माहिर है.

जैसे ही वो सलगांवकर परिवार की गर्दन पर हाथ डालता है, विजय के चारों तरफ ऐसा फंदा कसता है कि रोशनी की एक किरण भी नजर नहीं आती. विजय अपने ही बुने जाल में इस कदर घिरता है कि इस बार बचने का कोई देसी जुगाड़ काम आता नहीं दिखता. तो क्या इस बार विजय सलगांवकर पकड़ा जाएगा? ये जानने के लिए आपको थिएटर में जाकर अजय देवगन की ये फिल्म देखनी होगी.

Jaideep And Ajay Devgn

जयदीप और अजय देवगन

कैसी है फिल्म?

निर्देशक अभिषेक पाठक ने इस बार एक बहुत होशियारी भरा कदम उठाया. उन्होंने साउथ वाली ओरिजिनल फिल्म की तरह धीमी आंच पर कढ़ी पकाने का सब्र नहीं दिखाया. मलयालम वर्जन जहां बहुत धीमे-धीमे माहौल बनाता है, वहीं यहां अभिषेक ने सीधे एक्सिलेटर पर पैर दबा दिया. पहले ही फ्रेम से पुलिस की जीपें दौड़ने लगती हैं और विजय पर शिकंजा कसना शुरू हो जाता है. कहानी की ये बुलेट ट्रेन जैसी रफ्तार इस सोचके साथ दर्शकों को सीट से चिपकाए रखती है कि भइया अब आगे क्या होगा. लेकिन इसी आपाधापी में मेकर्स से एक छोटी चूक हो गई. ‘दृश्यम’ का असली हीरो सिर्फ विजय का दिमाग नहीं था, बल्कि उसका भरा-पूरा परिवार था. उस आदमी की रीढ़ उसकी पत्नी और उसकी दो बेटियां थीं, जिनके लिए वो दुनिया से लड़ रहा था.

लेकिन यहां सारा फोकस सिर्फ और सिर्फ पुलिस-चोर की रेस पर रख दिया गया. नंदिनी (श्रिया सरन) और दोनों बेटियों को स्क्रीन पर ऐसे खड़ा कर दिया गया जैसे बारात में दूर के रिश्तेदार खड़े होते हैं, न कोई ढंग का डायलॉग, न कोई खास मौजूदगी. जब परिवार की वो सिसकी और डर ही पर्दे से गायब हो गया, तो विजय की लड़ाई थोड़ी बनावटी लगने लगती है.

निर्देशन और राइटिंग

दृश्यम पिछले 2 पार्ट की तरह का इस पार्ट में भी ऑडियंस को अपने साथ बांधे रखती है. जब भी माहौल बहुत भारी और घुटन भरा होने लगता है, इंस्पेक्टर गायतोंडे (कमलेश सावंत) अपनी चिर-परिचित मुस्कान के साथ एंट्री मारते हैं. 2 अक्टूबर के मीम्स, सत्संग और पावभाजी पर उनके चुटीले वन-लाइनर्स थियेटर में बैठे दर्शकों को खूब गुदगुदाते हैं. डायलॉग्स में देसीपन है और वो माहौल को बिल्कुल बोरिंग नहीं होने देते. तकनीकी रूप से अमर मोहिले का बैकग्राउंड स्कोर भी हर मोड़ पर धड़कनें तेज करने का काम बखूबी करता है. मगर राइटिंग टेबल पर असली पेंच वहां फंसा जहां इस फ्रेंचाइजी की सबसे बड़ी पहचान हुआ करती थी यानी विजय के दिमाग की बत्ती. पहले पार्ट में जब विजय पुलिस को चकमा देता था, तो देखने वाले के मुंह से अनायास निकलता था, ‘अरे गजब, क्या दिमाग लगाया है!’ क्योंकि हर चाल के पीछे पक्की ईंट जैसा लॉजिक होता था. लेकिन इस बार क्लाइमैक्स में विजय जिस तरह से दांव खेलता है, उसमें चतुराई कम और किस्मत का खेल ज्यादा दिखता है.

Tabu Acting

तबू की एक्टिंग

ये कमियां शायद किसी दूसरी फिल्म में अनदेखी कर दी जातीं, मगर ‘दृश्यम’ 1 और 2 ने दर्शकों का मिजाज ऐसा बिगाड़ रखा है कि यहां जरा सी भी ढिलाई सीधे खटकती है. फिल्म आम मुकाबले में तो बाजी मार लेती है, पर अपनी ही विरासत के आगे थोड़ी 20 की जगह 19 हो जाती है.

एक्टिंग

एक्टिंग के मामले में अजय देवगन वो तुरूप का पत्ता हैं जो अकेले दम पर महफिल लूट लेते हैं. उनके चेहरे पर वही पुरानी संजीदगी है और वो अपनी गहरी, शांत आंखों से ही सारा खेल कर जाते हैं. एक बेबस बाप का तनाव और अपने चेहरे पर मासूमियत का नकाब ओढ़ने की उनकी कला लाजवाब है. तब्बू का रोल भले ही छोटा हो, मगर एक टूटी हुई मां के कलेजे की आग वो अपनी आंखों से साफ दिखा देती हैं. इस बार की सबसे तगड़ी एंट्री हैं जयदीप अहलावत. राजवीर के रोल में उन्होंने ऐसी जान फूंकी है कि जब वो स्क्रीन पर आते हैं, तो लगता है कि वाकई इस बार विजय सलगांवकर की शामत आ चुकी है. उनका ठंडा, बेपरवाह और खूंखार पुलिसिया अंदाज रोंगटे खड़े करता है. प्रकाश राज ने भी कोर्ट के अखाड़े में अपने तीखे तेवरों से समां बांधा है. वहीं श्रिया सरन को मेकर्स ने केवल एक सीन के भरोसे छोड़ दिया, जो उनके कद की एक्ट्रेस के साथ थोड़ी नाइंसाफी लगती है.

क्यों देखें और क्यों न देखें

अगर आपने ग्यारह साल तक 2 अक्टूबर का यह तमाशा शिद्दत से जिया है, तो इस महासंग्राम के अंत को मिस करना नाइंसाफी होगी. अजय देवगन और जयदीप अहलावत के बीच का माइंड गेम और आंखों की जंग देखने लायक है. फिल्म की रफ्तार इतनी तेज है कि आपको घड़ी देखने या बोर होने की फुर्सत नहीं मिलती. अगर आप पहले भाग जैसी अचूक, बेदाग और दिमाग हिला देने वाली लॉजिकल कहानी की उम्मीद बांधकर जा रहे हैं, तो आपको थोड़ा झटका लगेगा.

Ajay Family

विजय का परिवार

कुल मिलाकर ‘दृश्यम: द कन्क्लूजन’ उस शादी के ग्रैंड फिनाले जैसी है जहां बैंड-बाजा, रोशनी और खाना-पीना सब चकाचक है, मगर दाल में वो पहले वाला देसी घी थोड़ा कम रह गया. लेकिन ये फिल्म आपको बोर नहीं होने देती और पूरे ढाई घंटे बांधकर रखती है, जो आज के दौर में अपने आप में बड़ी बात है. मगर जिस फिल्म ने आम आदमी की अक्ल को ‘ताकत’ से बड़ा बना दिया था, वो अपने आखिरी इम्तेहान में कुछ आसान और फिल्मी रास्तों पर फिसल गई. खैर, खामियां अपनी जगह हैं, लेकिन ग्यारह साल से जिस विजय सलगांवकर के साथ पूरा देश सांस रोककर खड़ा रहा है, उसके इस आखिरी इम्तेहान को अलविदा कहने के लिए ही सही, यह फिनाले बड़े पर्दे पर देखना तो बनता है.

सोनाली नाईक
सोनाली नाईक

सोनाली करीब 15 सालों से पत्रकारिता की दुनिया में सक्रिय हैं. जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी करने के बाद प्रहार न्यूज पेपर से उन्होंने अपने करियर की शुरुआत की थी. इस न्यूज पेपर में बतौर रिपोर्टर काम करते हुए सोनाली ने एंटरटेनमेंट बीट के साथ-साथ सीसीडी (कॉलेज कैंपस और ड्रीम्स) जैसे नए पेज पर काम किया. उन्होंने वहां 'फैशनेरिया' नाम का कॉलम भी लिखा. इस दौरान एलएलबी की पढ़ाई भी पूरी की, लेकिन पत्रकारिता के जुनून की वजह से इसी क्षेत्र में आगे बढ़ने के इरादे से 2017 में टीवी9 से सीनियर कोरेस्पोंडेंट के तौर पर अपनी नई पारी शुरू की. टीवी9 गुजराती चैनल में 3 साल तक एंटरटेनमेंट शो की जिम्मेदारी संभालने के बाद सोनाली 2020 में टीवी9 हिंदी डिजिटल की एंटरटेनमेंट टीम में शामिल हुईं. सोनाली ने टीवी9 के इस सफर में कई ब्रेकिंग, एक्सक्लूसिव न्यूज और ऑन ग्राउंड कवरेज पर काम किया है. हिंदी के साथ-साथ गुजराती, मराठी, इंग्लिश भाषा की जानकारी होने के कारण डिजिटल के साथ-साथ तीनों चैनल के लिए भी उनका योगदान रहा है. रियलिटी शोज और ग्लोबल कंटेंट देखना सोनाली को पसंद है. नई भाषाएं सीखना पसंद है. संस्कृत भाषा के प्रति खास प्यार है. नुक्कड़ नाटक के लिए स्क्रिप्ट लिखना पसंद है. सोनाली के लिखे हुए स्ट्रीट प्लेज 'पानी', 'मेड इन चाइना' की रीडिंग 'आल इंडिया रेडियो' पर सोशल अवेयरनेस के तौर पर की जा चुकी है.

Read More