Mirzapur The Movie: कट्टा चला, खून बहा… फिर भी कहां रह गई कसक? इन 5 पहलुओं पर काम होता तो और यादगार बन जाती मुन्ना-गुड्डू की फिल्म
'मिर्ज़ापुर द फिल्म' में कट्टे भी चले और गूंजी सीटियां, लेकिन कुछ कमजोर कड़ियों ने पूरा स्वाद नहीं जमने दिय. जानिए वो 5 पहलू, जिन पर थोड़ी और मेहनत होती तो ये फिल्म और भी शानदार बन जाती.
‘मिर्ज़ापुर’ का नाम सुनते ही जेहन में कच्ची सड़कों पर दौड़ती गाड़ियां, कमर में खोंसे गए देसी कट्टे और जुबान पर चढ़ी गाली-गलौज तैरने लगती है. इस ब्रांड का इतना तगड़ा क्रेज था कि जब ये खबर आई कि गुड्डू पंडित और मुन्ना भैया का खूनी खेल अब 70mm के बड़े पर्दे पर उतरेगा, तो फैंस टिकट खिड़की पर टूट पड़े. थिएटर में तालियां भी बज रही हैं, सीटी भी गूंज रही है और एक्शन का भरपूर डोज भी मिल रहा है.
स्क्रीनप्ले कसा हुआ है और डायलॉग्स भी अपनी जगह फिट बैठते हैं, लेकिन थिएटर की बत्ती जलने के बाद मन में एक हल्की सी टीस रह जाती है. ऐसा लगता है कि अगर मेकर्स ने इन 5 खास पहलुओं पर थोड़ा और वक्त दिया होता, तो ये फिल्म सिर्फ एक अच्छी कोशिश बनने के बजाय इस फ़्रेंचायजी के लिए सबसे बड़ा माइलस्टोन साबित हो सकती थी.
1. कसी हुई राइटिंग, पर कहानी में वही घिसा-पिटा पुरानापन
फिल्म की सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि राइटर्स ने स्क्रीनप्ले को दौड़ाया तो बहुत तेज है, लेकिन कहानी की गाड़ी उसी पुराने ढर्रे पर चल रही है. जुर्म का वही पुराना महिमामंडन, वही कुर्सी की लड़ाई और बदले की वही पुरानी आग. मिर्जापुर की अपनी एक जबर्दस्त ब्रांड वैल्यू है और फिल्म उसी साख के कंधे पर सवार होकर निकली है. अगर आप उस चकाचौंध को हटाकर देखें, तो कहानी के नाम पर कुछ भी नया या चौंकाने वाला नहीं परोसा गया है. ऐसी गैंगस्टर कहानियां हम दशकों से देखते आ रहे हैं, बस यहाँ किरदारों के चेहरे जाने-पहचाने हैं.
2. पूर्वांचल छोड़ राजस्थान के रेतों में भटक गया देसी मिजाज
मिर्ज़ापुर को जिस चीज ने कल्ट बनाया था, वो थी यूपी-बिहार के बॉर्डर की वो ठेठ पूर्वांचली मिट्टी और वहां की संकरी गलियों का माहौल. फिल्म में रवि किशन के किरदार बब्बन यादव के तार जोड़ने के लिए कहानी को खींचकर राजस्थान के रेगिस्तानों तक पहुंचा दिया गया. नो डाउट, सिनेमैटोग्राफी के लिहाज से राजस्थान में फिल्माए गए फाइट सीन्स विजुअली बहुत रिच और खूबसूरत दिखते हैं. लेकिन जब कहानी अपनी जमीन छोड़ती है, तो वो जो असली देसीपन था, वो थोड़ा बनावटी लगने लगता है.
3. बॉलीवुडिया ओवर-द-टॉप एक्शन
मिर्जापुर सीरीज का नियम सीधा कि यहां एक गोली लगती थी और आदमी ढेर हो जाता था. वही जमीनी हकीकत दर्शकों की रीढ़ में सिहरन पैदा करती थी. मुन्ना भैया भी इससे बच नहीं पाए थे. लेकिन फिल्म के फॉर्मेट में आते ही मेकर्स टिपिकल कमर्शियल बॉलीवुड फॉर्मूले का शिकार हो गए. पर्दे पर सामने से लगातार मशीनगन से गोलियों की बौछार हो रही है, बबलू भैया सामने से दौड़ रहे हैं और एक भी गोली उन्हें छू तक नहीं पाती! ये जो ‘हीरो को गोली नहीं लगती’ वाला 90s का लॉजिक है, वो मिर्ज़ापुर की रियलिस्टिक दुनिया से बिल्कुल मेल नहीं खाता. इस तरह के ओवर-द-टॉप सीन्स उस खौफ और सस्पेंस का मजा किरकिरा कर देते हैं.
4. लेडी गैंग को पूरी तरह साइडलाइन कर देना
मिर्ज़ापुर की असली ताकत सिर्फ बंदूकों वाले मर्द कभी नहीं रहे. इस दुनिया का रिमोट कंट्रोल हमेशा बीना त्रिपाठी (रसिका दुगल) के शातिर दिमाग और गोलू गुप्ता (श्वेता त्रिपाठी) की बगावत के हाथ में रहा है. लेकिन फिल्म के 3 घंटे के दायरे में इन बेहद मजबूत और परतदार किरदारों को सिर्फ नाममात्र की मौजूदगी तक समेट दिया गया. बीना भाभी के हिस्से थोड़े बहुत रंग जरूर आए हैं, लेकिन बाकी महिला किरदार सिर्फ फ्रेम भरने के काम आते दिखते हैं. जब आप अपनी सबसे मजबूत ताश की पत्तियों को ही टेबल पर नहीं उतारेंगे, तो खेल में वो पुराना रोमांच कैसे पैदा होगा?
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5. कालीन भैया का ‘कंट्रोल’ और मास्टरमाइंड वाला रुतबा फीका
अखंडानंद त्रिपाठी यानी कालीन भैया का पूरा वजूद उनकी खामोशी में था. वो कमरे में दाखिल होते थे, तो बिना हथियार उठाए भी हवा में एक दहशत तैरने लगती थी. उनकी चाणक्य नीति ही पूरे मिर्ज़ापुर की धुरी थी. मगर फिल्म में गुड्डू के अंधाधुंध किरदार और मुन्ना के लाउड ड्रामे को स्पेस देने के चक्कर में कालीन भैया का वो खामोश दबदबा बैकसीट पर चला गया. यहां तक कि कहानी के कुछ मोड़ों पर बबलू का दिमाग पूरी बाजी पर भारी पड़ता दिखता है और कालीन भैया किसी बुजुर्ग की तरह सिर्फ घटनाओं पर रिएक्ट करते नजर आते हैं. जब किंग ऑफ मिर्ज़ापुर ही थोड़ा असहाय दिखे, तो दर्शकों का वो पुराना भरोसा डगमगाने लगता है.
‘मिर्ज़ापुर द फिल्म’ मनोरंजन का एक तेज तर्रार पैकेज जरूर है, जिसमें कट्टे और गालियों का वो पुराना सुरूर मिलता है लेकिन अगर कहानी को अपनी जमीन से बांधकर रखा जाता और एक्शन में बॉलीवुडिया तड़के की जगह वो पुराना रियलिज्म बरकरार रहता, तो ये फिल्म सिर्फ थिएटर्स में शोर नहीं मचाती, बल्कि दशकों तक याद रखी जाती.




