Mirzapur The Movie: मनोरंजन का फुल एक्शन ड्रामा… लेकिन गद्दी की सियासत का मैसेज भी
मिर्जापुर द मूवी का बैकड्रॉप और किरदार आदि पहले से ज्ञात है. ऐसे में रिस्क कम नहीं था. क्या एक लंबी कहानी महज 3 घंटे में दर्शकों को संतुष्ट कर पाएगी? समझते हैं डायरेक्टर इस कसौटी पर कितना खरा उतरे.
साल 2018 की बात है. नवंबर का महीना था. ओटीटी का पर्दा युवा दर्शकों के लिए नई दुनिया से कम नहीं था. तब मिर्जापुर वेब सीरीज आई थी. उस वक्त पंकज त्रिपाठी आज की तरह बड़ा चेहरा नहीं थे. हालांकि अभिनय के अंदाज में भौकाल मचा दिया था. आज मिर्जापुर द मूवी के समय फिल्म इंडस्ट्री में उनकी एक स्थापित शख्सियत है. अब 4 सितंबर, 2026 को रिलीज हुई फिल्म को जब हम देखते हैं तो कालीन भैया के रोल में पंकज त्रिपाठी केवल किंग नहीं रह जाते बल्कि सत्ता के फिलॉस्फर गाइड भी बन जाते हैं. उनके संवाद पांडित्यपूर्ण हो जाते हैं. वह विद्वान पंडित की भाषा में बातें करते हैं और डराते हैं.
कालीन भैया मिर्जापुर के किंग अखंडानंद त्रिपाठी बातों-बातों में बताते हैं, गद्दी का नियम क्या होता है- दुश्मन चाहे कितना भी छोटा हो, उससे सावधान रहना चाहिए या फिर गद्दी ना तो विरासत से मिलती है न सियासत से, मिलती है तो बाहुबल से… इसी का विस्तार है- बाहुबली मारते नहीं, मारने का ऑर्डर देते हैं. आदि आदि.
फिल्म महज थिएटर एडिशन नहीं
मिर्जापुर द मूवी में बहुत कुछ नया भी है. यह वेब सीरीज का महज थिएटर एडिशन नहीं है. फिल्म में रवि किशन और जितेंद्र कुमार जैसे नए कलाकार हैं तो प्रसंग भी कई नए हैं. कहानी का विस्तार मिर्जापुर की सीमा ही नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश के बॉर्डर से भी बाहर निकलता है और राजस्थान के जैसलमेर के रेतीले रेगिस्तान तक पहुंच जाता है. अब तक आपने मिर्जापुर की गलियां देखी, बहराइच और जौनपुर की गद्दी के प्रसंग देखे हैं लेकिन इस बार कहानी राजस्थान पहुंचती है और गद्दी की लड़ाई दो राज्यों में फैले अंडरवर्ल्ड तक पहुंच जाती है.
कहानी में एक बार फिर मिर्जापुर की गद्दी की खौफनाक खूनी लड़ाई है. कालीन भैया के साथ-साथ बाकी किरदारों का भी भौकाल कम नहीं है. वैसे सीरीज की तरह फिल्म की कहानी भी बताती है कि मिर्जापुर की गद्दी पर कब्जा का मतलब है यूपी की राजनीति पर दबदबा और यूपी की राजनीति में दखल का मतलब है, देश की सियासत पर कब्जा. फिल्म के संवादों में यूपी में आने वाले चुनाव की भी चर्चा होती है और इसके लिए बाहुबली अपने-अपने अंडरवर्ल्ड की गतिविधियों को धार देने लगे हैं.
फिल्म में इस बार यादव किरदार भी हैं-जेपी यादव और बब्बन यादव. सामने हैं पहले से ही मौजूद-त्रिपाठी जी. दोनों के अपने-अपने उसूल हैं, गद्दी संभालने और भौकाल मचाने के उसूल-जो कह दिया सो कह दिया. परिवार की भौकाली की यही विरासत है.
‘यादव’ ने दी ‘त्रिपाठी’ को चुनौती
इसी क्रम में मिर्जापुर की गद्दी पर आसीन अखंडानंद त्रिपाठी उर्फ कालीन भैया को एक नई चुनौती मिलती है- कहानी के नए किरदार बब्बन यादव से, जिसे रवि किशन ने बेहतरीन तरीके से निभाया है. कालीन भैया और उसके खूंखार बेटे मुन्ना त्रिपाठी के खात्मे का इरादा लेकर बब्बन यादव जौनपुर वाले रति शंकर शुक्ला से हाथ मिलाता है. मकसद वही मिर्जापुर की गद्दी हासिल करके यूपी की सत्ता पर कब्जा जमाना है. बब्बन यादव का काला साम्राज्य जैसलमेर तक फैला है. इसके आगे क्या क्या होता है. कहानी में गुड्डू पंडित, मुन्ना त्रिपाठी और बब्लू पंडित क्या-क्या कारनामे को अंजाम देते हैं, इसे जानने के लिए फिल्म देखें.
मनोरंजन का फुल एक्शन ड्रामा
लेकिन आपको इतना जरूर बताएं कि मिर्जापुर द मूवी कई मायने में मनोरंजन का फुल एक्शन ड्रामा है. दर्शकों को भरपूर आनंद आने वाला है. हां, सीरीज वाली भाषा और सीन उतने देखने को नहीं मिलेंगे लेकिन सीरीज के मसाले का पूरा फ्लेवर है. फिल्म में खूब-खराबा के सीन भी खूब हैं लेकिन यहां हिंसा वाजिब तरीके से दिखाई जाती है. एक्शन क्राइम ड्रामा की इन कथित कमजोरियों से बचने की कोशिश की गई है. इस मोर्चे पर डायरेक्टर-राइटर (गुरमीत सिंह-पुनीत कृष्णा) में बेहतर तालमेल दिखता है. जरूरत के हिसाब से गोलियां चलती हैं और जानें ली जाती हैं.
3 घंटे में फिल्म को कितना समेटा जा सका?
पहले इस बात की आशंका थी कि तीन सीरीज की बिखरी और लंबी कहानी को आखिरकार तीन घंटे में कैसे समेटा जा सकेगा, कितने नये प्रसंग होंगे या कि सभी कलाकारों को कितना-कितना स्पेस मिल सकेगा. वहीं जब रवि किशन भी पंकज त्रिपाठी के सामने होंगे तो बाकी किरदारों का क्या होगा. लेकिन फिल्म जब देखते हैं तो मुन्ना त्रिपाठी (दिव्येंदु), गुड्डू पंडित (अली फजल), बब्लू पंडित (जितेंद्र कुमार), बीना त्रिपाठी (रसिका दुग्गल), स्वीटी गुप्ता (श्रिया पिलगांवकर), मुमताज बीबी (सोनल चौहान) और गोलू गुप्ता (श्वेता त्रिपाठी) आदि को भी वाजिब स्पेस मिलता है और अपने-अपने कैरेक्टराइजेशन को जस्टीफाई करते हैं.
फिल्म में जानी-पहचानी कहानी होने की चुनौती
मिर्जापुर द मूवी के साथ एक बात ये फेवर में जाती है कि ना केवल इसका बैकड्रॉप बल्कि किरदार, कलाकार और कहानी भी एकदम जानी-पहचानी है. कई बार नवीनता की कमी की वजह से इसका नुकसान होता है तो परफेक्शन फायदा भी पहुंचाते हैं. सीरीज से बनी फीचर फिल्म के साथ ये खासियत जुड़ जाती है. डायरेक्टर और राइटर का फ्रेम दर्शकों की कसौटी पर खरा उतरता दिखता है. थिएटर में आस-पास बैठे दर्शक भरपूर आनंद उठाते देखे गए हैं.
परफॉर्मेंस की कसौटी पर पंकज त्रिपाठी एक बार फिर अभिनय के महापंडित साबित हुए हैं लेकिन विलेन के रोल में रवि किशन भी कड़ी टक्कर देते दिख रहे हैं. पलड़ा बराबरी का नजर आता है. बब्बन यादव कहानी को नए जॉनर में ले जाते हैं जो फिल्म का सबसे नायाब पक्ष है. फिल्म में बब्बन यादव के किरदार से नई रवानी आती है. हां, दिव्येंदु से कहीं ज्यादा स्पेस अली फजल और जितेंद्र कुमार पा लेते हैं.
दिव्येंदु और अली फजल की कैमेस्ट्री भविष्य में कहानी का नया द्वार खोलती है. अगर किसी फिल्म में साथ-साथ दिखे तो रोमांचक हो सकता है. पंचायत वाले जितेंद्र कुमार विक्रांत मैसी का बढ़िया रिप्लेसमेंट साबित हुए हैं. कुल मिलाकर मिर्जापुर द मूवी सीरीज की तरह ही बड़े पर्दे पर भी भरपूर मनोरंजन करती है.
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